Monday, 21 June 2021

महाराष्ट्रातील नैसर्गिक आपत्ती (भाग १)

 

B.A.II. History Paper IV

महाराष्ट्रातील नैसर्गिक आपत्ती (भाग १)

 

B.A.II. History Paper IV महाराष्ट्रातील नैसर्गिक आपत्ती (भाग १)

महाराष्ट्रातील नैसर्गिक आपत्ती कोयना भूकंप (१९६७)आणि लातूर भूकंप (१९९३)

    प्राचीन काळापासून आपत्तीचा फटका/ तडाखा पृथ्वीवरील जीवसृष्टीला मोठ्या प्रमाणात सहन करावा लागलेला आहे. सिंधू संस्कृती ही भूकंपाने गडप झालेली होती काही प्राण्यांचे अवशेष वृक्ष जमिनीत गडप होऊन त्यापासून कोळसा होणे इ. उत्खननामध्ये संशोधनात उपलब्ध झालेले आहे. महाराष्ट्रात पुराने थैमान घातले व सांगली कोल्हापूर सातारा इत्यादी परिसरातील जनजीवन अस्थिर झाले.

    Disaster या इंग्रजी शब्दाला आपण मराठीत आपत्ती असे म्हणतो. Dis म्हणजे वाईट आणि Aster म्हणजे तारा. या दोन शब्दांपासून आपत्ती शब्द तयार झालेला आहे.

    आपत्ती ची व्याख्या.

       " अचानक आलेले संकट उत्पात अथवा दुर्घटना कोणत्याही क्षेत्रात घडली असून ती मानवनिर्मित व नैसर्गिक असते. या घटनेद्वारे व्यापक प्रमाणात मानवप्राणी व मालमत्ता अथवा दोन्ही प्रकारची हानी झालेली असते. अशा संकटाशी प्रतिकार करणे स्थानिक लोकांच्या आटोक्याबाहेर असेल अशा संकटात आपत्ती असे म्हणतात"

       भारत सरकारने 2005 साली आपत्ती व्यवस्थापन कायदा अमलात आणला. त्यामध्ये वरील व्याख्या दिलेली आहे.

       संयुक्त राष्ट्रसंघाने आपत्ती ची व्याख्या " एक अशी घटना की ज्यामुळे अगदी आकस्मिकपणे प्रचंड जीवित हानी व इतर प्रकारची आणि संभवते त्यास आपत्ती असे म्हणतात''. अशी केली आहे.

       जागतिक आरोग्य संघटनेने "मानवास आलेल्या संकटाची त्यात कोणतीही पूर्वसूचना नसणे आपत्तीमुळे होणारे विध्वंसक परिस्थिती फारच भयानक स्वरूपाचे असणे व त्यानुसार होणारी वित्त व जीवित हानी सहजासहजी भरून न येणे यास आपत्ती असे म्हणतात" कशी केली आहे.

       ऑक्सफर्ड शब्दकोशात "आकस्मिकपणे ओढवलेले मोठे दुर्दैवी संकट म्हणजे आपत्ती होय"असे म्हटले आहे.

       आपत्ती ही मानवनिर्मित व निसर्गनिर्मित असे दोन्ही प्रकारचे असते. पुढील प्रकार पडतात.

       अ.   पर्यावरण विषयक आपत्‍ती

       आ. भौगोलिक आपत्ती

        इ . अतिरेकी व कलहामुळे उद्भवलेल्या आपत्ती

        ई. निष्काळजीपणामुळे उद्भवलेल्या आपत्ती

        उ . जैविक आपत्ती

        ऊ .  नैसर्गिक आपत्ती

        ए. मानवनिर्मित आपत्ती

निसर्ग निर्मित आपत्ती चे प्रकार

१). त्सुनामी. याला शास्त्रीय भाषेत भूकंपाच्या समुद्र लाटा किंवा भूकंपाच्या सागरी लाटा असे म्हणतात ही अत्यंत घातक आहे. समुद्राच्या विस्तीर्ण तळाशी भूगर्भात भूकंप घडल्याने ज्या पर्वतप्राय लाटा उसळतात त्यांना सुनामी म्हणतात.  यामुळे किनारपट्टीलगत ची जीवित हानी बांधकामे झाडे नष्ट होतात.

२). महापूर. ही भयंकर आपत्ती आहे अतिवृष्टीमुळे नद्या-नाले यापुढे तो धोक्याच्या पातळीवर बाहेर यावे असा पूर येतो तेव्हा नदीपात्राच्या दोन्ही बाजूंना असलेली मानवी वस्ती जंगले इमारती वेढून/पाडून प्रचंड हानी होते.

३). जंगलातील वणवा. जंगलास आग लागते आणि ज्वालाग्राही पदार्थ पेटल्याने संपूर्ण जंगल पेटते त्यात असलेली सर्व जीवसृष्टी नष्ट होते.

४). वादळे /चक्रीवादळे  . सातत्याने अमेरिकेत आणि अशाच सुद्धा वादळे चक्रीवादळे येतात आणि प्रचंड हानी करतात.

५). भूस्खलन. जमिनीची धूप झाल्याने, झाडे तोडल्याने, खडी साठी डोंगर खोदल्याने, घाटामधून रस्ते काढल्याने डोंगर कमजोर होतात आणि कोसळतात.

६). अवर्षण /कोरडा दुष्काळ . सर्व आवश्यक इतका पाऊस न पडल्याने अन्नधान्य आणि पाण्याच्या दुर्भिक्ष त्यामुळे तहान-भूक उपासमार होऊ शकते.

७). अति पर्जन्यवृष्टी. अतिवृष्टी आहे वाईट प्रकार आहे.

८). साथीचे रोग. निम्न उत्पन्न गटातील राहणीमान हे कमालीचे अनारोग्याचे असते. यामुळे साथीच्या रोगांचा प्रादुर्भाव होतो. गॅस्ट्रो, पटकी, कावीळ, साथीचे रोग गोवर, खोकला, कांजिण्या, क्षय, डासापासून हिवताप, प्लेग, चिकनगुनिया, गजकर्ण, नायटा, खरुज, इ.

९). भूकंप. "पृथ्वीच्या कवचात कोणत्याही कारणाने शोभा निर्माण होऊन पृथ्वीच्या पृष्ठभागाला अचानक व जाणवत नाही इतक्या बसलेल्या धक्क्याला भूकंप म्हणतात."जर त्याची तीव्रता मोठी असेल तर प्रचंड हानी होते.

      

      

            

 

भाषाविज्ञान के प्रधान अंग

 (Eknath Patil)

T. Y. B. A. , HINDI  ,  paper no - 16  ,semester - 06 

भाषाविज्ञान के प्रधान अंग


भाषाविज्ञान भाषा का सर्वांगीण अध्ययन प्रस्तुत करता है। अत: उसमें भाषा के सभी घटकों का अध्ययन होता है। 'भाषा' शब्द के द्वारा उसके मुख्य चार घटकों का बोध होता है। ये चार घटक ही भाषाविज्ञान के प्रधान अंग हैं।


1) safa fasta (Phonetics)


3) वाक्य विज्ञान (Syntax)


2 ) पदविज्ञान / रूप विज्ञान (Morphology )


4) अर्थविज्ञान (Semantics)


इसके अतिरिक्त डॉ. भोलानाथ तिवारी ने भाषाविज्ञान के और दो अंग बताए हैं


1) शब्द विज्ञान (Wordalogy) 2) प्रोक्ति विज्ञान (Discoursology)


भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि है। ध्वनि का ही सर्वप्रथम उच्चारण होता है। अनेक ध्वनियों के समुदाय से शब्द बनता है । अनेक पदों की रचना से वाक्य बनता है और वाक्य से पूरे अर्थ की प्रतीति होती हैं। इनमें से प्रत्येक अंग का भाषाविज्ञान के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है।1.ध्वनि विज्ञान  

(Phonetics) -


ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत ध्वनियों का विभिन्न दृष्टियों से अध्ययन किया जाता है। भाषा के अंदर ध्वनि का बहुत महत्त्व है । वस्तुत: ध्वनि भाषा की लघुत्तम इकाई है, जिसका पुनः विभाजन नहीं किया जा सकता। मानव ध्वनि को 'स्वन' भी कहते हैं। ध्वनि -समूह से ही भाषा का निर्माण होता है। ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत उन्हीं ध्वनियों का अध्ययन होता है, जिनके संयोग से भाषा का निर्माण होता है।

ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत ध्वनियों का विभिन्न दृष्टियों से अध्ययन किया जाता है। भाषा के अंदर ध्वनि का बहुत महत्त्व है । वस्तुत: ध्वनि भाषा की लघुत्तम इकाई है, जिसका पुनः विभाजन नहीं किया जा सकता। मानव ध्वनि को 'स्वन' भी कहते हैं। ध्वनि -समूह से ही भाषा का निर्माण होता है। ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत उन्हीं ध्वनियों का अध्ययन होता है, जिनके संयोग से भाषा का निर्माण होता है।) .ध्वनियों के साथ-साथ इनके उच्चारण स्थान का भी अध्ययन ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत होता है। ध्वनियों का उच्चारण जिन अंगों से होता है, उन्हें समग्र रूप से 'वाग्यंत्र' कहते हैं। ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत इस बा की रचना, इसके विभिन्न अंगों के कार्य आदि का अध्ययन किया जाता है। वाग्यंत्र के कई अंग होते हैं, जिनसे विभिन्न ध्वनियों का उच्चारण होता है। जैसे- ओष्ठ्य अंग से 'प' वर्ग की ध्वनियों का, कण्ठ अंग से 'क' बुर्ग की ध्वनियों का उच्चारण होता है।


ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत ध्वनियों में जो विभिन्न प्रकार के परिवर्तन होते हैं, उनके कारणों और दिशाओं का भी अध्ययन किया जाता है। इन कारणों और दिशाओं के अध्ययन का आधार वैज्ञानिक होता है। अर्थात् सम्यक रूप से यह अनुशीलन होता है कि, ध्वनि परिवर्तन के इन कारणों और दिशाओं का आधार क्या है? इन परिवर्तनों का रूप क्या होता है?


ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत ध्वनि संबंधी एक और महत्वपूर्ण विषय का अध्ययन होता है, जिसका नाम


'ध्वनि नियम' है। ये ध्वनि नियम विभिन्न प्रकार के ध्वनि परिवर्तनों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। इसके


अंतर्गत इस बात का अध्ययन होता है, कि इन नियमों का संबंध किस भाषा से है ? किस काल विशेष से है और


इनका कार्य किन सीमाओं के अंदर रहकर संपादित होता है? उदाहरण के लिए ग्रिम नियम को लिया जा सकता है।


इस तरह ध्वनि विज्ञान का समकालिक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन होता है।


ध्वनि अध्ययन के तीन प्रमुख आधार हैं- उच्चारण, प्रसरण या संवहन तथा श्रवण। इसी आधार पर ध्वनि विज्ञान की मुख्यतः तीन शाखाएँ मानी जाती हैं- (1) औच्चरणिक ध्वनि विज्ञान - इस शाखा में उच्चारण और उससे सम्बद्ध बातों का अध्ययन होता है। (2) सांवहनिक या प्रासरणिक ध्वनि विज्ञान इस ध्वनि विज्ञान की शाखा में उच्चारण के फलस्वरूप बनने वाली ध्वनि-लहरों का अध्ययन होता है। इस अध्ययन में प्रायः कायमोग्राफ, स्पेक्टोग्राफ, अॅसिलोग्राफ आदि यंत्रों का प्रयोग होता है। (3) श्रावणिक ध्वनि विज्ञान इस शाखा में ध्वनियों की श्रवण प्रक्रिया का अध्ययन होता है। इस प्रकार उच्चारण, संवहन और श्रवण तक का अध्ययन ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत आता है।

2)   पद विज्ञान या रूप विज्ञान

इसे 'रूप विचार' या 'पद रचना शास्त्र' भी कहते हैं। 'ध्वनि' भाषा की लघुत्तम इकाई है। ध्वनियों के समूह से शब्द का निर्माण होता है तथा शब्दों के समूह से वाक्य का, और सार्थक वाक्यों के समुच्चय से भाषा का निर्माण होता है। परंतु शब्द तथा वाक्य के मध्य रचना प्रक्रिया की दृष्टि से एक और सीढ़ी है, जिसका नाम 'पद' है। ‘पद' शब्द का सीधा अर्थ है पैर। पैर का काम है चलना। एक प्रकार से हम यह कह सकते हैं कि जब मूल शब्द वाक्य में चलने लगता है, अर्थात एक निश्चित अर्थ देने लगता है, तब वह पद बन जाता है। इस प्रकार वाक्य केवल होना चाहिए। इसके लिए शब्दों में प्रत्यय, विभक्तियाँ आदि जोड़ते हैं। जब मूल शब्द में प्रत्यय, विभक्ति आदि के शब्दों का समूह मात्र ही नहीं होता; अपितु उन शब्दों में एक निश्चित अर्थ बोध के लिए, परस्पर संबंध भी स्थापित


योग से विकार उत्पन्न हो जाता है, तब उसे पद कहा जाता है। उदाहरण के लिए 'राम', 'रावण', 'बाण', 'मारा' इन चार शब्दों को ले सकते हैं। इन शब्दों का अपना एक निश्चित अर्थ है, जो मूलार्थ है । यदि परिवर्तन किए बिनाही हम इन शब्दों से वाक्य बनाना चाहे तो असफल रहेंगे। इनके पारस्परिक संबंध को दर्शन के लिए इन शब्दों में परिवर्तन कर हम एक पूर्ण वाक्य बना सकते हैं; जैसे, राम ने रावण को बाण से मारा। इससे वाक्य में प्रयुक्त शब्दों का पारस्परिक संबंध स्पष्ट होता है। इस वाक्य में राम, रावण, बाण, मारा जैसे शब्द 'अर्थतत्त्व कहलात हैं, तथा ने, को, से जैसे विभक्ति चिह्न तथा 'आ' जैसे प्रत्यय 'संबंध तत्त्व' कहलाते हैं। इस प्रकार अर्थतत्त्व तथा संबंध तत्त्व के योग से बना शब्द 'पद' कहलाता है। भाषा विज्ञान की इस इकाई के अंतर्गत भाषा के वैयाकरणिक रूपों के विकास, कारण तथा धातु, उपसर्ग, प्रत्यय, विभक्ति आदि का अध्ययन किया जाता है। लिंग, वचन, काल आदि से संबंधित परिवर्तनों का अध्ययन भी इसी के अंतर्गत होता है। रूप निर्माण प्रक्रिया भी इसके अंतर्गत आती है। रूप परिवर्तनमूलक तथा व्युत्पत्तिमूलक परिवर्तनों का अध्ययन भी इसी के अंतर्गत होता है। यह अध्ययन समकालिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक तीनों ही प्रकार का हो सकता है। 

 3) वाक्य विज्ञान ( Syntax)भाषा का कार्य विचार-विनिमय है, जिसका माध्यम वाक्य है। भाषा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग वाक्य ही है। भाषाविज्ञान में वाक्य के अध्ययन के विभाग को 'वाक्य-विज्ञान' या 'वाक्य-विचार' कहा जाता है। इस विभाग के अंतर्गत वाक्य की संरचना, उसके आवश्यक उपकरण आदि का मनोवैज्ञानिक और सूक्ष्म अध्ययन होता. है। यह अध्ययन करते समय भाषा में वाक्य प्रयोग की स्थिति और उसके अर्थ पर भी विचार किया जाता है।


वस्तुत: विविध पदों से वाक्य का निर्माण होता है। वाक्य विज्ञान के अंतर्गत वाक्य का पद विन्यास संबंधी अध्ययन एवं विवेचन होता है। वाक्य सार्थक होता है और सार्थक वाक्यों से भाषा की रचना होती है। इस प्रकार किसी भी वाक्य के अंदर दो मुख्य बातें निहित होती है, जिन्हें उद्देश्य और विधेय के रूप में जाना जाता है। वाक्य में जिसके विषय में कुछ कहा जाता है, उसे उद्देश्य कहते हैं और उद्देश्य के बारे में जो कुछ कहा जाता है, उसे ‘विधेय’ कहते हैं। जैसे - ‘राम पुस्तक पढ़ता है।' इस वाक्य में 'राम' उद्देश्य है, और 'पुस्तक पढ़ता है' यह विधेय है । इन दोनों का सम्यक् अध्ययन वाक्य विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है, जिससे वाक्य की संरचना और उसके अर्थ विशेष को समझने में सरलता रहती है।


वाक्य विज्ञान के अंतर्गत वाक्य के प्रकारों का भी अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन का आधार वैज्ञानिक होने के कारण यह पूर्ण और सुस्पष्ट होता है। वाक्य विज्ञान के अंतर्गत वाक्य की रचना, पदों का महत्व, पदान्वय, वाक्य के भेद, परिवर्तन के कारण और दिशाएँ, केंद्रिकता आदि का सम्यक्, सूक्ष्म और पूर्ण अध्ययन एव विवेचन होता हैं। इसके तीन रूप हैं- (i) समकालिक, (ii) ऐतिहासिक (ii) तुलनात्मक ।


4) अर्थ विज्ञान (Semantics)

अर्थ भाषा का आंतरिक पक्ष है, जिसे 'आत्मा' की संज्ञा दी जाती है। भाषा सार्थक व्यवस्था होने के कारण उसकी प्रयोजनीयता अर्थ के द्वारा ही संभव है। कुछ विदेशी विद्वान, जिनमें अमेरिकी अग्रगण्य हैं, अर्थ को भाषाविज्ञान का विषय न मानकर दर्शन अथवा मनोविज्ञान का विषय मानते हैं। लेकिन ऐसा मानने का तात्पर्य ध्वनियों को निरर्थक मान लेना होगा। किंतु ऐसा मान लेना भी सार्थक नहीं है; क्योंकि संप्रेषणीयता भाषा कीसर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। दूसरे, ध्वनि, वाक्य, रूप और शब्द भाषा के शरीर मात्र का कार्य करते हैं। उसकी आत्मा तो 'अर्थ' ही हैं, जिसके अध्ययन के बिना भाषा का अध्ययन अधूरा-सा ही रह जाएगा। साथ ही रही है। इससे समाज मनोविज्ञान के साथ अर्थ और उसके विकास के कारण आदि जुड़े हैं। शब्दों के अर्थ और उसके परिवर्तन के कारण, अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ, अर्थ और ध्वनि का संबंध, पर्याय, विलोमता आदि का समकालिक, तुलनात्मक, ऐतिहासिक दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है। इसके अन्य नाम 'अर्थ-विचार' और 'अर्थ 'उद्बोधशास्त्र' भी हैं।


5) शब्द विज्ञान (Wordalogy)

यह विभाग परंपरा से हटकर डॉ. भोलानाथ तिवारी ने ही किया है। देश-विदेश के अन्य विद्वानों ने रचना के अंतर्गत ही शब्दों पर विचार किया है; किंतु शब्दों का वर्गीकरण किसी भाषा के शब्द समूह में परिवर्तन के कारण एवं दिशाएँ, शब्द समूह, कोश विज्ञान और व्युत्पत्तिशास्त्र इसी विभाग के अंग हैं। व्युत्पत्तियों के अध्ययन के समय शब्दों का तुलनात्मक एवं ऐतिहासिक अध्ययन भी किया जाता है।


6) प्रोक्ति विज्ञान (Discoursology)

किसी बात को कहने के लिए प्रयुक्त वाक्यों के समुच्चय को 'प्रोक्ति' कहते हैं, जिसमें एकाधिक वाक्य आपस में सुसंबद्ध होकर अर्थ और संरचना की दृष्टि से इकाई बन गए हों। अंग्रेजी शब्द 'डिस्कोर्स' के लिए प्रतिशब्द के रूप में हिंदी में 'प्रोक्ति' शब्द का प्रयोग हो रहा है। प्रोक्ति के अध्ययन के लिए भोलानाथ तिवारी जी ने हिंदी में 'प्रोक्तिविज्ञान' और अंग्रेजी में 'डिस्कोर्सालोजी' नाम दिया है। भारतीय काव्यशास्त्री प्रोक्ति के लिए 'महावाक्य' का प्रयोग प्राचीन काल में करते थे। आधुनिक युग में समाज भाषा विज्ञान के विकास के कारण प्रोक्ति की ओर लोगों का ध्यान अब गया है।


अर्थ और संरचना आदि सभी दृष्टियों से विचार करने पर प्रोक्ति ही भाषा की मूलभूत सहज इकाई ठहरती है, यह तिवारी जी का मत है। क्योंकि समाज में विचार विनिमय के लिए प्रोक्ति का प्रयोग किया जाता है । प्रोक्ति का विश्लेषण करने पर वाक्य मिलते हैं। उदाहरण के लिए, “लंका के अत्याचारी राजा रावण अयोध्या के राजकुमार राम की पत्नी सीता को उठाकर अपने रथ पर बिठाकर ले गया। पता चलने पर राम और उनकी सेना ने उस पर चढ़ाई की । युद्ध में रावण पक्ष के काफी लोग मारे गए। अंत में वही हुआ, जो होना था। राम ने रावण को बाण से मारा और रावण वीरगति को प्राप्त हुआ।" यह एक प्रोक्ति है, जिसमें कई वाक्य हैं; जैसे - युद्ध में रावण पक्ष के काफी लोग मारे गए या राम ने रावण को बाण से मारा आदि। ये सभी वाक्य आपस में सुसम्बद्ध हैं।


'प्रोक्तिविज्ञान' भाषाविज्ञान की वह शाखा है, जिसमें प्रोक्ति का अध्ययन-विश्लेषण किया जाता है। यह अध्ययन भी समकालिक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक, सैद्धांतिक रूप में हो सकता है।

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