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Thursday, 8 July 2021

कितने प्रश्न करुॅ - ममता कालिया राम का चरित्र चित्रण

 Eknath Patil

S. Y. B. A.  ,  HINDI  ,  paper no - 06  , semester - 04  , 

कितने प्रश्न करुॅ  - ममता कालिया   राम का चरित्र चित्रण :


प्रस्तुत खंडकाव्य में सीता का चरित्र ही मुख्य है। बाकी सारे चरित्र सीता की व्यथा और उनके विद्रोही रूप को ठोस और गहरा बनाने के लिए खंडकाव्य में चित्रित है।                  1) दूसरा प्रमुख पात्र :


प्रस्तुत खंडकाव्य में राम सिर्फ एक बार अपनी पूर्व धारणा और अपनी उसी पुरानी अटल निश्चयात्मकता के साथ उपस्थित होते हैं। इसके पहले राम का सारा चरित्र सीता की मनःस्थिती के माध्यम से हमारे सामने आता है। परंतु खंडकाव्य के प्रत्येक प्रसंग का संबंध प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राम के साथ जुड़ा हुआ है।


(2) शूरवीर :


प्रस्तुत खंडकाव्य में राम शूरवीर महापराक्रमी राजा के रूप में चित्रित है। जनक राजा द्वारा आयोजित सीता के स्वयंवर में अनेक वीर भूपति सम्मिलित होते हैं। कोई भी महाकाय शिवधनुष्य को उठा नहीं पाते तभी अयोध्या के राजकुमार राम का आगमन होता है। राम भरी सभा में महाकाय शिवधनुष्य उठाकर धराशायी करा देता है -


जब भरी सभा में उठकर अकस्मात ही तुमने


दो टूक धराशायी कर दिया धनुष्य शिव


बनवास के समय अनेक असुरों का संहार करते हुए राम लंका पहुँचते है। राम और रावण के बीच घमासान


युद्ध होता है। राम अपने शक्ति के बल पर रावण का संहार कर देते हैं। लंका पर विजय प्राप्त करके सीता को वापस अयोध्या ले आते हैं। प्रस्तुत खंडकाव्य में राम का चरित्र वाल्मिकी कृत 'रामायण' तथा तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' की


3) मर्यादा पुरुषोत्तम राम :


तहमा पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित है। खंडकाव्य में विवाह, अपहरण, अग्निपरीक्षा, निर्वासन और पृथ्वीप्रवेश इनमें से किसी प्रसंग में अपनी मर्यादाओं को लांघते हुए दिखाई नहीं देते।                          4) लोकनिर्णय का सम्मान करनेवाला राजा :


राजा राम अपने परिजनों से भी प्रजा के बारे में अधिक चिंतित दिखाई देते हैं। राजाराम लोकहितैषी उदात्त राजा के रूप में चित्रित है। लोकनिर्णय का सदा सम्मान करना उनकी विशेषता है। वे मर्यादा पुरुषोत्तम है। प्रजा दद्वारा शंका उपस्थित होने पर अपनी जीवनसंगीनी प्रिय पत्नी सीता का भी निर्वासन करते हैं। अगर राम चाह तो संशय व्यक्त करनेवालों को कड़ी से कड़ी सजा दे सकते थे। परंतु राम ऐसा नहीं करते क्योंकि उन्हें प्र -पत्नी से भी प्रजा महत्त्वपूर्ण है।               5 . अनिष्ठ निवारक :


वाल्मिकी 'रामायण' या तुलसी कृत 'रामचरितमानस' हो इनमें राम अनिष्ट निवारक के रूप में चित्रित हैं। विवेच्य खंडकाव्य में भी राम अनिष्ट निवारक महान राजा के रूप में चित्रित है। बनवास के समय अनेक अ का वध करके ऋषि मुनियों के संकटों को दूर करते हैं। महापराक्रमी असुरों के राजा लंकापति रावण का वध करके उनके भाई विभिषण को लंका का राजा बनाते हैं।


(6) एक आदर्श राजा :


विवेच्य खंडकाव्य में सीता का चरित्र प्रमुख है। राम का चरित्र सीता की व्यथा और उनके विद्रोह को ठोस बनाने के लिए चित्रित है। परंतु राम का चरित्र अपने आप में विशेष महत्व रखता है। वे एक आदर्श लोकहितैषी राजा के रूप में चित्रित है। प्रजा भी उनका सम्मान करती है। अयोध्या के राजा दशरथ राम को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। परंतु कैकेयी को दिए वचन निभाते हैं। राम को चौदह साल का बनवास सुनाते हैं। राम पिता के आदेश का पालन करते हुए चौदह साल बनवास के लिए निकल पड़ते हैं। विवेच्य खंडकाव्य में राम मर्यादा पुरुषोत्तम राजा के रूप में चित्रित है। प्रस्तुत खंडकाव्य में राम एक आदर्श पुत्र, आदर्श राजा, आदर्श मित्र, आदर्श भाई आदि गुणों के रूप में चित्रित हुए हैं।


अतः प्रस्तुत खंडकाव्य में राम दूसरा प्रमुख पात्र है। राम शूरवीर धीरोदात्त, महापराक्रमी, मर्यादा पुरुषोत्तम लोकनिर्णय का सम्मान करनेवाला, अनिष्ठ निवारक एक आदर्श राजा के रूप में चित्रित है।                              3. वाल्मिकी का चरित्र चित्रण :


वाल्मिकी प्रस्तुत खंडकाव्य का महत्त्वपूर्ण चरित्र है। निर्वासन के समय लक्ष्मण सीता को तमसा के किनारे छोड़कर वापस लौटते हैं। रोती कलपती सीता जल-समाधि लेने के बारे में सोचती है। लेकिन उनके भीतर बैठी हुई माँ उन्हें इस आत्मघात से बचाती है। इसमें ऋषि कवि वाल्मिकी भी सहायक होते हैं। बेबस, बेकसुर सीता को वाल्मिकी सहारा देते हैं। उसके 'संरक्षक' बनकर खड़े होते हैं। वे सिर्फ सीता को शरण ही नहीं देते बल्कि सीता के बच्चों का परिपालक भी बनते हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा देते हैं। युद्ध विद्या में उन्हें निपुण बनाते हैं। इसके अलावा वे रामकथा के रचियता है। सीता वाल्मिकी ऋषि के आश्रम एक साधारण स्त्री की तरह रहने लगती है। अपने जुड़वाँ पुत्रों की सेवा शुश्रूषा में अपनी जिंदगी गुजार देना अब अपनी नियति समझने लगती है। वे लव-कुश को युद्ध विद्या के साथ-साथ रामायण के गायन में पारंगत करते हैं। तभी राम के अश्वमेध यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए ऋषि वाल्मिकी को निमंत्रण आता है और वे दोनों बालकों को लेकर यज्ञभूमि में पहुँचते हैं। शत्रुघ्न और साक्षात् वाल्मिकी के मुख से राम को पता चलता है कि सीता जीवित है और वह वाल्मिकी के आश्रम में रह रही है। राम गुरूजनों और ऋषियों से चर्चा करके सीता को पुनः वापस लेने का अपना निर्णय वाल्मिकी को सुनाते हैं और उन्हें इसके लिए राजी कर देते हैं। इससे भी आगे वे राम और सीता के पुनर्मिलन में मध्यस्थ की भूमिका भी अदा करते हैं। इस रूप में बाल्मिकी की मध्यस्थ बड़ी महत्त्वपूर्ण है।वे राम के निर्णय को उचित भी ठहराते हैं। सीता के सारे तर्कों के बावजूद उन्हें राम के निर्णयों में पूरी आस्था है। वे राम द्वारा दिए गए निर्वासन को भी राजा और प्रजा के संबंधों के लिए उचित ठहराते हैं। लेकिन राम के निर्णयों को उचित ठहराते हुए भी वे सीता के ऊपर अपने विचार नहीं लादते बल्कि उन्हें निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ देते हैं। यही नहीं शपथ ग्रहण के सार्वजनिक समारोह में वे सीता की निष्कलंकता के पक्ष में अपना सीधा-सादा किंतु प्रबल तर्क देते हैं। इस प्रकार प्रस्तुत खंडकाव्य में समन्वयकारी चरित्र के रूप में कवयित्री ने हमारे सामने वाल्मिकी को प्रस्तुत किया है।

कितने प्रश्न करुॅ / सीता का चरित्र चित्रण

 Eknath Patil

S.Y.B.A. , HINDI  , paper no - 06 , semester  - 04  ,        

 कितने प्रश्न करुॅ  / सीता का चरित्र चित्रण :


चरित्र-चित्रण खंडकाव्य का दूसरा मुख्य तत्त्व है। खंडकाव्य का आकार महाकाव्य की तुलना में छोटा होता है। परिणामतः खंडकाव्य में पात्रों की संख्या सीमित होती है। इसमें चरित्र का विकास भी उतना ही होता है जितना कथावस्तु के विकास में आवश्यक हो। खंडकाव्य में महाकाव्य की तरह मुख्य और गौण पात्रों की योजना की जाती है। प्रस्तुत खंडकाव्य नायिका प्रधान है। इसमें सीता, राम, हनुमान, वाल्मिकी आदि प्रमुख पात्र है। रावण खलनायक के रूप में चित्रित है। सीता के चरित्र की चारित्रिक विशेषताएँ निम्न हैं -


1) नायिका :


सीता प्रस्तुत खंडकाव्य की नायिका है। प्रस्तुत खंडकाव्य सीता के चरित्र को केंद्र में रखकर लिखा गया है। सीता केंद्रीय पात्र है। खंडकाव्य के विवाह प्रसंग से लेकर पृथ्वी प्रवेश की घटना तक के सभी प्रसंगों का संबंध प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से सीता के साथ जुड़ा है। प्रस्तुत खंडकाव्य में सीता का चरित्र पूरी राम कथा में कई तरह के सवाल उठाता है। उन्हीं सवालों को कथा से जोड़कर देखा गया है। अतः सीता प्रस्तुत खंडकाव्य की नायिका के रूप में चित्रित है।


2) निष्कलंक नारी :


प्रस्तुत खंडकाव्य में सीता का चरित्र निष्कलंकित नारी के रूप में चित्रित है। प्रजा द्वारा शंका उपस्थित होने पर निर्दोष सीता को जंगल में छोड़ दिया जाता है। अशोक वाटिका में लंकापति रावण सीता को अनेक प्रलोभन दिखाता है। अनेक यातनाएँ देता है। फिर भी सीता अपने आप को पतिव्रता एवं निष्कलुष रखती है। जब लंका विजय के बाद लंका वापस लौटती है तो उसे अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता है। तब भी वह निष्कलंक साबित होती है।


3) राम के प्रति आकृष्ट


धनुष्य भंग का प्रसंग राम के प्रति सीता की गहरी स्नेह अनुरक्ति का प्रतीक है.


लज्जा से नत आँखे थी


देखा मैंने कारों से।


या कितना भिन्न तुम्हारा


व्यक्तित्व वहाँ औरों से।


प्रेम और गहरी अनुरक्ति का यह प्रसंग राम की अद्वितीयता से जुड़ा हुआ है। प्रस्तुत खंडकाव्य में राम अपने सौंदर्य, शौर्य, अपने कर्मों और निर्णयों में अद्वितीय है। अतः सीता धनुष्य भंग प्रसंग से ही राम के आकृष्ट है।


4) हर घडी पति का साथ देनेवाली :


विवेच्य खंडकाव्य में नायिका सीता संकट के समय सायें की तरह राम का साथ देती है। शिवधनुष्य उठाते राम के प्रथम दर्शन से लेकर बनवास तक के हर सुख-दुःख की घड़ी में राम के साथ खड़ी रहती है। वह राम के आदेशों का पालन करती है। राजमहल में पली बडी सीता चौदह साल तक अनेक संकटों का सामना करती है। नवविवाहित सीता पति राम के साथ बनवास के लिए निकल पड़ती है। लंका में अनेक संकटों का सामना करती है। किसी सामान्य प्रजा के द्वारा चरित्र पर उँगली उठाने पर वह राम के आदेशों का पालन करती है। अग्निपरीक्षा देती है।


5) दृढ संकल्पी :


सीता दृढ संकल्पी है। अशोक वाटिका में रावण सीता को अनेक यातनाएँ देता है। सीता हर संकट का डटकर मुकाबला करती है। रावण द्वारा अनेक लालच दिखाए जाते हैं। वह स्वयं अशोकवाटिका में आकर साम, दाम, दंड, भेद से सीता की राम के प्रति अटल भक्ति को खंडित करना चाहता है और फिर आत्मसमर्पण के लिए विवश करने का प्रयत्न करता है। परंतु सीता के दृढ संकल्प से राक्षस नारियाँ भी पिघल जाती है। रावण के षडयंत्र का पर्दाफाश करती है।                       6 ) पतिव्रता :


प्रस्तुत खंडकाव्य में सीता का चरित्र पतिव्रता नारी का प्रतिनिधित्व करता है। अनेक संकटों एवं प्रलोभनों के बावजूद भी सीता में पतिव्रता की कोई कमी नहीं है। सीता अगर चाहती तो हनुमान के साथ वापस लौट सकती थी। और पलभर में रावण के सारे खेल मिट्टी में मिला सकती थी। हनुमान राम के परमप्रिय भक्त और अनुगामी थे। वह बहुत सोच-विचार करके हनुमान के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती हैं। इस संबंध में भी उनका मुख्य तर्क राम के प्रति उनकी पति-भक्ति ही है -


“फिर पतिव्रता नारी का


पति के अतिरिक्त किसी के, संग जाना उचित नहीं था,


विपरित काल हो चाहे।"


धनुष्य भंग के समय उसने राम का जो भी रूप देखा था उसके संदर्भ में स्त्री ज्ञान के नाते उनके मन में यह बात जरूर होती कि स्वयं राम उन्हें अपहरण से मुक्त करें।


7) विद्रोही नारी :


विवेच्य खंडकाव्य में सीता का विद्रोही रूप चित्रित है। राम रावण का संहार करके सीता की लंका की कारागृह मुक्ति करते हैं। इस घटना से सीता बेहद खुश होती है। मन में अनेक सपने सजाए हुई थी। तभी से उसके सामने अग्निपरीक्षा का प्रस्ताव रखा जाता है। इस प्रस्ताव से सीता खिन्न हो जाती है। वह मन ही मन कहती हैं, लंका में अनेक संकटों का सामना करने के बावजूद भी शाश्वत पतिव्रत का कवच बनाया। फिर भी अग्निपरीक्षा का प्रस्ताव मेरे सामने रखा गया। सीता मन ही मन कहती है -


"क्या महाबली मारूती ने नहीं बताया ?


Eknath Patil, [07.07.21 12:02]

तुमको था मैंने शाश्वत पतिव्रत


लंका में कवच बनाया।


8) आत्मविश्वास से परिपूर्ण :


अग्निपरीक्षा के प्रस्ताव से सीता खिन्न होती है। अपने मन की आंतरिक दृढ़ता और आत्म-विश्वास से वे उसे स्वीकार करती है। क्योंकि सीता को अपनी निष्कलुषता पर अटल विश्वास है। अग्निपरीक्षा में वह निष्कलंक साबित होती है। इस प्रसंग में देवता भी उसके पतिव्रता रूप का गायन करते हैं। अशोक वाटिका में रावण अनेक प्रलोभन दिखाता है। सीता अनेक संकटों का सामना करती है। उसे दृढ विश्वास है कि श्री राम उसे इस संकट से बाहर निकालेंगे।

9) निर्वासित नारी :


प्रस्तुत खंडकाव्य में सीता निर्वासित है। वह निर्वासन का विरोध नहीं कर पाती क्योंकि वह अकेली है। प्रजा, सम्राट तथा परिवार का कोई भी सदस्य उनकी ओर से बोलने के लिए तैयार नहीं है। राम शूरवीर लोकहितैषी उदात्त राजा है। लोकादर्श उनके साथ होने के बावजूद भी करूण असहाय तर्कों के अलावा सीता के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं रह जाता। गर्भवती होने के बावजूद भी सीता के निर्वासन का लोक-निर्णय हो जाता है। लक्ष्मण रोती-कलपती सीता को तमसा के किनारे छोड़ आते हैं।                   10) आदर्श माता :


निर्वासन के बाद सीता जलसमाधि लेने के बारे में सोचती है। परंतु भीतर बैठी ममत्व की भावना इस आत्मघात से बचाती है। सीता एक साधारण स्त्री की तरह ऋषि वाल्मिकी के आश्रम में रहती है। वह अपने जुड़वाँ पुत्रों (लव-कुश) की सेवा-शुश्रूषा में अपनी जिंदगी गुजार देना चाहती है। वह लव-कुश का अच्छी तरह से पालन-पोषण करती है।


11 ) राम के लोकनिर्णय की शिकार :


लंका की कारागृह से मुक्ति के बाद सीता खुश थी। वह अपने मन में अपने सपने सजाई हुई थी। तभी उसे लोकनिर्णय का शिकार होना पड़ता है। इस घटना से वह दुःखी हो जाती है। उसे निर्वासन की स्थि गुजरना पड़ता है। क्योंकि प्रजा, समाज तथा परिवार का एक भी सदस्य सीता की ओर से बोलने के लिए तैयार नहीं है। राम गुरूजनों और अन्य ऋषियों से परामर्श करके सीता को पुनः वापस लाने का निर्णय वाल्मिकी को सुनाते हैं। इस समय भी सीता के सामने अग्निपरीक्षा का प्रस्ताव रखा जाता है। निर्दोष होने के बावजूद भी सीता को बार-बार लोकनिर्णय का शिकार होना पड़ता है। निर्वासन के समय सीता का मन आकुल होकर उभर आता


“तुमने मेरी सुचिता पर


फिर से संदेह दिखाया


जन-निंदा के माध्यम से अपना सवाल दोहराया।"


निष्कर्ष :


अतः बार-बार प्रताडित भारतीय नारी के अपमान के विरूद्ध सीता का चरित्र एक प्रतीक बनकर हम सामने प्रकट होता है। प्रस्तुत खंडकाव्य सीता के चरित्र के माध्यम से नारी और पुरूष के संबंधों की नई व्याख्या और एक नया समाधान प्रस्तुत करता है। अतः प्रस्तुत खंडकाव्य में सीता के चरित्र से निष्कलंकता, पतिव्रता, विद्रोही, दृढ संकल्पी, आत्मविश्वासी, निर्वासित नारी, आदर्श माता आदि चारित्रिक विशेषताएँ प्रकट होती है।

Wednesday, 30 June 2021

किसान के घर से (यात्रा संवाद)

 Eknath Patil, [30.06.21 15:24]

F. Y. B. A.  ,  HINDI  , paper  no - II  ,  semester  - II     किसान के घर से (यात्रा संवाद)


मधु कांकरिया


लेखिका परिचय


लेखिका मधु कांकरिया का जन्म 23 मार्च, 1957 को हुआ। वे सामान्य परिवार की महिला थी। शिक्षा दीक्षा पूरी होने के बाद लेखन कार्य के साथ जुड गई।


प्रकाशित रचनाएँ -


उपन्यास - खुले गगन के लाल सितारे, सलाम आखिरी, पशा खोर, सेज पर संस्कृति, रहना


नहीं देस वीराना है।


कहानी संग्रह - अंतहीन मरूस्थल, और अंत में यीशु, बीतते हुए, भरी दोपहर के अंधेरे में। सम्मान कथाक्रम सम्मान 2008 को मिला। हेमचंद्र साहित्य सम्मान से सम्मानित किया


गया।


'किसान के घर से' स्वतंत्र भारत में आज किसान की स्थिति अत्यंत दयनीय बन गई है। वह एक वक्त की रोटी के लिए तरस रहा है, जिसे अनाज का निर्माता कहा जाता है। विशेषतः मराठवाडा में किसान अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। जैसे काशी विश्वेश्वरराव किसान दिन ब-दिन कर्ज की दल-दल में फँसा जा रहा है। इसलिए वह निराश बनकर आत्महत्या कर रहा है। यह वास्तव लेखिका ने चित्रित करने का प्रयास किया है।भूमंडलीकरण और औद्योगिक विकास के इस दौड में किसानों की सतत उपेक्षा, उनके प्रति लोगों का दृष्टिकोन, किसानों का खेती से पलायन, आत्महत्या के भयावह आँकडे केवल एक समस्या नहीं भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है। इस चेतावनी को प्रेमचंद और संजीव के बाद मधु कांकरिया ने पहचान लिया है। अपने यात्रा संवाद में मराठवाडा को केंद्र में रखकर समूचे देश के किसानों की समस्याएँ लोगों के सामने रखी है। लेखिका को नाना पाटेकर के शब्द याद आ रहे थे जिन्होंने कहा था, "मुंबई की सड़क पर कोई भिखारी मिला तो उसे भिखारी समझिए वह किसान भी हो सकता है।" 1997 से लेकर अब तक दो लाख किसानों ने आत्महत्या की थी। मिडीया को वह खबर नहीं दिख रही थी, उसे आधुनिकता की चकाचौंध दिख रही थी।


लेखिका का पुत्र और उनके दो मित्र मिलकर मराठवाडा के जालना जिले के कुछ गावों में आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवार को कुछ करने का जज्बा लेकर जा रहे थे। वे तीनों ही कॉर्पोरेट कलर (सामूहिक संस्कृति) में पले बढे युवक थे। लेखिका ने उनके साथ चलने की इच्छा प्रकट की लेकिन लेखिका के पुत्र ने कहा, “लिखने से कुछ नहीं होगा। उसमें ठोस कार्यवाही या मदत की जरूरत वह भी तुरंत।" तब लेखिका ने कहा था, “हमारा काम दुबके सत्य को बाहर लाना है, तुम लोगों ने भी तो सच्चाई पहले जानी। फिर जाने का और उनके लिए कुछ करने का मन बनाया।" उन्होंने 'हिंदू' अखबार में छपे साईनाथ के दो दिन पहले के उनके आलेख और किसानों की आत्महत्या पर लिखे संजीव के उपन्यास 'फांस' को दिखा दिया, जिसमें यह भी कहा, "इसके लिए लिखना काम जरूरी है। बेटा सोच बदलकर उनको ले जाने के लिए राजी हो जाता है।


लेखिका जालना जिले के बलखेड गांव में गयी थी। वहाँ चारों ओर अकाल ही दिख रहा था। सभी ओर सूखे हुए घास, कही कही जली हुई घास तथा जमीन पर सूखे पलाश थे। पेड की डालियों पर रुई के टुकडे लटके हुए थे। जगह-जगह पर कचरे के ढेर पडे थे। पोलिथिन, व्हीम बारके कवर जैसे हिंदुस्तान लीवर के व्हीम बार का प्रयोग जादा मात्रा में होता है। गाँव में काटेदार पेड, एक ही कुआँ और एक मंदीर है। लेखिका ने देखा बैलगाडी में टीन का पीपाथा, जो पानी के लिए प्रयुक्त हो रहा है। गाँव का वर्णन करते हुए टीन (पत्रे) की छत नीचे बंधी गाय और पेड से बंधी फरमती भैस। झोपडीनुमा खपरैल के छत वाले घर में मुस्लिम युवतियाँ हैं। खेल खत्म होते बाजार शुरू होता है, “चौपहिया गाडीवाले ढेले पर श्रृंगार की ढेर सारी सामग्री बेचता एक तरुण। उसके पाउडर, लिपस्टिक, क्लिप, नेल पोलिश, सेफ्टी पिन आदि थे।” साथ ही कचरे के ढेर पर घूमते सुअर उसके बगल में जूस सेंटर, हेयर कटिंग सलून आदि का सूक्ष्म से वर्णन किया है।


लेखिका और उनके साथियों को अरुणगिरी के घर जाना या जिन्होंने आठ महिने पूर्व आत्महत्या की थी। उनकी पत्नी संगीता, बेटी और उनके चार भाई डेढ एकर के ट्रॅक्टर चला रहे थे। ट्रॅक्टर के पीछे छोटा-सा कपडे का पोस्टर था जिसपर लिखा था, "आत्महत्याग्रस्त शेतकरी कुटुंबांना मदतीचा हात, चला करूया दुष्काळावर मात" (आइए आत्महत्या ग्रस्त किसानों के परिवार की मदत करे)। अरूण गिरी जी ने नाउम्मीदी और हताशा से खेत में कीटकनाशक पी लिया था। उनके छोटे भाई विजयगिरी ने पेड की ओर इशारा करते उसके ही छाया में जहर पीने का बात कही। उन्होंने दीपेश को बोलते हुए कहाँ कि स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद से 37 हजार का कर्जा लिया था। जिसकी नोटीस आई थी। कुछ प्राईवेट कर्जा था जिसकापाच टका ब्याज हर महिने चढ रहा था। बैक की नोटीस की गाँव में चर्चा, बदनामी के कारण उनको चिंता खा गयी थी। बाळासाहेब ने कहा 100 रुपये पर पांच रुपया हर महिने सूद यहां तक 100 रुपए पर 25 तक ब्याज लिया जाता है। अरुणगिरी की पत्नी संगीता पैंतीस से चालीस के बीच की उम्र में कह रही थी, “सब कुछ अचानक हुआ। वैसे जब तक


Eknath Patil, [30.06.21 15:24]

रहे रात दिन दौडते-खटते ही रहे। फिर भी पूरा नहीं पड़ता था तो कर्जा लेना पड़ गया। वह कर्जा ही गले का फंदा बन गया।" बैंक की नोटीस आने से घबरा गए। घर से कुछ नहीं कहा। सुबह जाकर ही आत्महत्या कर ली सरकार से सिर्फ तहसीलदार से मिलकर बैंक कर्जा माफ कर दिया। लेखिका कहती है, किसान के लिए कर्ज मतलब उसके माथे पर लिखी 'एक्सपायरी डेट' है। आगे कहती है मेरे बेटे के पास कार लोन या होम लोन के लिए बार-बार बैंक से फोन आते है वह भी सिर्फ 8% ब्याज वही भी सालाना। यहाँ महिने के लिए 5 से 25 प्रतिशत से कर्जा लेना पड़ता है। दिलीप कालेकर जैसे किसान मेथा बँक लिमिटेड से कर्जा लिया था, 13% सूट पर, वह भी बड़ी मुश्किल से जितना माँगा उसे एक चौथाई मिला था। किसी ने एक जगह लिखा भी है, मोटारसाईकिल के लिए तुरंत कर्जा मिलता है लेकिन खेती के लिए नहीं मिलता। लेखिका ने कहाँ जितना आदमी गरीब उतनी ब्याज की मात्रा अधिक होती है।


शहर में वही बात उल्टी है। मुंबई से सबसे पॉश इलाके में बैंक तीन एकड जमीन सिर्फ एक रुपये से भी कम प्रति वर्ग फीट की दर पर मिलती है। मुंबई में एक मिनिट के लिए बिजली नहीं जाती है, यहाँ आठ-नऊ घंटे गायब होती है। इसके बाद वे काशी विश्वेश्वर राव के परिवार की ओर गए जिनकी आत्महत्या से पूरे जिले को हिलाकर रख दिया था। बाळासाहेब ने बता दिया था कि उनको 'प्रोग्रेसिव फार्मर ऑफ दि इयर' का अॅवॉर्ड मिला था। लेखिका ने बाळासाहेब से कहा कि क्या उन्होंने सुसाइड नोट छोडा था। तब उसने कहा, “दलदल में धँसा किसान क्या एक दिन मरता है? हर दिन वह थोडा-थोडा मरता है। उसकी जमीन उसका कवच-कुंडल होती है, जिस दिन वह निकल जाती है हाथ से, समझो उलटी गिनती शुरू हो जाती है।" जिस काशी विश्वेश्वर राव ने लोगों को हिंमत दीथी वही जिंदगी से उठ गया, जिसके पीछे बैंक लोन और सोसायटी का कर्जा था। डरते हुए बालासाहेब कहता है हर दिन दिल धड़कता रहता है। अब आगे कौन मरेगा? इससे लेखिका ने छोटे किसान से बड़े किसान की आत्महत्या पर प्रकाश डाला है।


लेखिका को पिछले साल हुई लुधियाना की घटना याद आती है। जिसमें 36 साल के किसान जयवंत मोटर साइकिल पर अपने पाँच साल के बेटे को घुमाने निकले। बेटे को अपनी छाती से बाँधकर कॅनाल में कूद गए जिन पर 6 लाख का कर्जा था। जिनकी फसल खराब हो गयी थी। उन्होंने सुसाइड नोट में लिखा था, "मैं जानता हूँ कि मेरा यह छह लाख का कर्जा मैं तो क्या मेरा बेटा भी जीवन भर उतार नहीं सकता। उसी तरह पंजाब में एक किसान की बेटी ने फाँसी लगा ली थी। उन्होंने सुसाइट नोट में लिखा था। मेरे पापा पर पहले से बहुत कर्जा है। पिछले तीन साल से फसल पर घाटा हुआ है। मेरी शादी के लिए पापा और कर्जा लेने की सोच रहे है। उसी कारण उस लड़की ने आत्महत्या की थी। लेखिका को लगता है कि, यह संकट सिर्फ किसानों पर नहीं है तो पूरी सभ्यतापर संकट छाया हुआ है। लेखिका कहती है कोई यात्रा पूरी नहीं होती। यह भी यात्रा इनकी पूरी न हुई थी। सिर्फ तीन परिवारों से लेखिका मिल पायी। उनके जीवन में न त्योहार है न उत्सव है न आनंद, तो सिर्फ तीनही चीजे है वह कर्ज, कर्ज और कर्ज। किसान जिंदगी भर कपास की पैदास करता है लेकिन पत्नी की कॉटन की साड़ी तक नहीं खरीद पाता। वह सिर्फ सस्ती और टिकाऊ पोलिएस्टर की साडी खरीद सकता है। सब्सिडी के नाम पर दस साल में एक रिलीफ पॅकेज। कर्जा देती है ट्रॅक्टर को 14% लोन 6% लोन ब्याज दर पर देती है। बालासाहेब के माध्यम आम किसान की व्यथा बताती है। अमरिका ने 2005 में किसानको सब्सिडी दी थी। 4 मिलियन डॉलर और उत्पादन हुआ था 3.9 मिलियन डॉलर यात्री उत्पादन से ज्यादा हर साल सब्सिडी मिलती है। हमारे भारत देश में 2 लाख किसान मर गए। किसी को परवाह नहीं है। लेखिका मधु कांकरिया ने किसान की व्यथा को पाठक के सामने यथार्थता से प्रकट किया है।


इसीतरह भारतीय किसान सबका पेट भरने और तन ढकनेवाला होते हुए खुद ही भूखा और अर्धनंगा सो जाता है। मधु कांकरिया ने 'किसान के घर से' यात्रा संवाद को जीवंतता के साथ चित्रित किया है। आज किसान की आत्महत्या के नाम पर हत्या हो रही है। भूमंडलीकरण के दौर में किसान इसमें कहीं भी बैठ नहीं पाता है। यहाँ उनकी उपेक्षा और समस्याएँ बढती जा रही है। इस प्रकार आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों में किसान धँसता जा रहा है। आज यही भारत की ज्वलंत और बुनियादी समस्या है।

Tuesday, 22 June 2021

रजिया (रेखाचित्र) - रामवृक्ष बेनीपुरी

 (Eknath Patil)

रजिया (रेखाचित्र) - रामवृक्ष बेनीपुरी

F. Y. B. A.  ,  HINDI  ,  paper no - II  ,  semester - II  ,     

लेखक परिचय :

रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी के सिद्धहस्त रेखाचित्रकार के रुप में मशहूर है। उनका जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गाँव में जनवरी 1902 में हुआ। पिता का नाम कुलवंतसिंह था। एक साधारण किसान परिवार में बेनीपुरी जी का बचपन गुजरा। आपकी आरंभिक शिक्षा ननिहाल (बंशीपचरा) तथा बेनीपुरी में हुई। आप साहित्य विशारद तक पढे। काव्य लेखन से बेनीपुरी जी की साहित्यिक यात्रा का श्रीगणेशा हुआ।


साहित्य सृजन के साथ आपने पत्रकारिता तथा राष्ट्रभाषा का कार्य किया। साहित्य सर्जन के क्षेत्र में रेखाचित्र के अलावा - बेनीपुरी जी ने नाटक, जीवनी, कहानी, उपन्यास, निबंध तथा बालसाहित्य में अपना योगदान किया। आपने लगभग सौ ग्रंथों की रचना की। इनमें से उल्लेखनीय है - माटी की मूरते, पतितों के देश में, लाल तारा, गेहूँ और गुलाब, आदि। अंबपाली, संघ मित्रा, अमर ज्योति बेनीपुरी जी की सफल नाट्य रचनाएँ रही है। आपके द्वारा संपादित 'विद्यापति की पदावली' बहुचर्चित रही।


बेनीपुरी जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। आपका व्यक्तित्व क्रांतिकारी था। आपकी भाषा प्रौढ एवं परिमार्जित रही। आप संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू के जानकार थे। आप स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे। सन् 1930 से 1942 के काल में आपका अधिकतम समय कारावास में जेल जीवन के संस्मरण (जंजीरे और दीवारे) त्याग और बलिदान की कहानियाँ है। सन 1968 में आप स्वर्ग सिधारे। गुजरा। आपके


प्रकाशित रचनाएँ


'लाल तारा' (1946), माटी की मूरते' (1950)


'गेहूँ और गुलाब' (1957), 'मील के पत्थर' प्रकाश में आए है।


प्रस्तुत रेखाचित्र में गाँव की एक मुसलिम चूडीहारिनी, जो इस गाँव में एकमात्र है, उसका चित्र खींचा गया है। इस चूडीहारिनी का नाम हैं- 'रजिया' जब वह छोटी थी, अपनी माँ के साथ लेखक के घर अक्सर आया करती थी। इसी प्रकार वह पूरे गाँव में अपनी माँ के साथ घूमा करती थी। उसके कानों में हमेशा चाँदी की बालियाँ, गले में चाँदी का हेकल, हाथों में चाँदी के कंगन और पैरो में चाँदी की गुडाई रहती थी। उसका यह साज- -श्रृंगार बाल्यावस्था में लेखक को हमेशा आकर्षित करता रहताथा। कभी-कभी तो लेखक रजिया का पीछा तक करता था। तब रजिया की बूढी माँ, मजाक में कह भी देती थी "बबुआजी, रजिया से ब्याह कीजिएगा?" और संकोच के कारण लेखक वहाँ से खिसक जाता था।'रजिया' का आशय :


रामवृक्ष बेनीपुरी का उत्कृष्ट और कालजयी व्यक्तिपरक रेखाचित्र रजिया है। रजिया एक सच्ची ग्रामीण दृष्टि प्रदान करनेवाली मुस्लिम चूडीहारिनी पात्र है। लेखक का रजिया का वर्णन बाल्यावस्था और साज-श्रृंगार वर्णनआकर्षित लगता है। लेखक की भावना परम वैयक्तिक तथा निजी अनुभूतियों से युक्त है। लेखक द्वारा नायिका, वातावरण, घटनाएँ तथा संबंध के परिवेश एक दूसरे से इस प्रकार घुलमिल जाते है जिसकी एकसूत्रता अवश्य बनी रहती है। लेखक ने कहा कि गाँव में एक मात्र पात्र अलग है जिसका चित्र खींचा गया है।


लेखक ने 'रजिया' का वर्णन शुरूआत में ही ऐसा सुंदर रेखांकित किया है जो पाठकों के सामने पात्र को खड़ा करते हैं। वे कहते है कि, “रजिया ने कानों में चाँदी की बालियाँ पहनी हैं। गले में पहनने का सुंदर चाँदी का गहना है। हाथों में चाँदी के कंगन डाले है और पैरों में चाँदी के गोंडाई (पायल) पहने हैं। रजिया ने भर बाँह की बूटेदार कमीज पहनी है। काली साडी के छोर को गले में लिपटा है। गोरे चेहरे पर लटकते हुए बाल संभालने में परेशान छोटी-सी लड़की लेखक के सामने खड़ी होती है। लेखक अपने बचपन की बात कहते है कि स्कूल से आते है जैसे मानो कसाईखाने से रस्सी तोडकर आए हुए बछडे है। स्कूल से आकर मौसी के दिए हुए छठपूजा में बनाए ठेकुए लेखक झूले बैठकर खा रहा था। इतने में आवाज आती है, “खाना मत छूना" तब उसका ध्यान छोटी रजिया पर जाता है। हिंदु बस्ती में उन्होंने कभी मुस्लिम लड़की को देखा नहीं था। क्योंकि बचपन में एक मेले में लेखक खो गया था तब उन्हे अघोरी विधा के अनुयायी उठाकर ले जा रहे थे तभी गांव की एक लड़की नजर पड़ी और उसी कारण वह बच पाये। माँ-बाप का बचपन में ही साया उठने से उनका पालन मौसी ने किया था। मौसी उसे कभी अपने आँखो से ओझल नहीं होने देती थी। गाँव में बहुत सी लड़कियाँ थी लेकिन रजिया जैसी वेशभूषा, चाँदी के गहने, रंग-रूप, आँखों का नीलापन और समूचे चेहरे का ढंग देखकर उसे एक टक लेखक घूरने लगा। जहाँ से आवाज आयी थी, वह रजिया की माँ थी। रजिया की माँ ने लेखक के आँगन में चूडियों का बाजार पसारकर रखा था। वहाँ बहुतसी बहू बेटियाँ उनको घेर कर चूडियों का मोल भाव कर रही थी। उस बच्ची को पहली बार देखकर उत्सुकता जाग गयी। मौसी ने उसे भी ठेकुए और कसार दिया। वह लड़की नहीं ले रही थी। माँ के कहने से लेने के बाद लेखक ने उसे सवाल पूछे उसके जवाब सिर्फ गर्दन हिलाकर ही दिया।

रजिया और उनकी माँ खरीदारिनों की तलाश में दूसरे आँगन में चली गयी। लेखक उनके पीछे चला गया तब रजिया की माँ ने कहा, "बबुआजी, रजिया से ब्याह कीजिएगा?" फिर बेटी की ओर मुखातिब हो मुस्कराहट से कहा, "क्योंरी रजिया, यह दूल्हा तुम्हें पसन्द है?" उनके कहने से वहाँ से लेखक भागता है। ब्याह और वह भी मुसलमान लड़की से? उनके जाने के बाद उन्होंने मुडकर देखा। रजिया चूडिहारिन इसी गाँव में रहनेवाली थी। बचपन, जवानी और शादी भी इसी गाँव के मुसलमान लड़के से हो गयी और कभी-कभी लेखक से उनकी मुलाकात होती रहती थी। लेखक पढ़ते-पढते शहर में पढ़ने गया। छुट्टी में जब भी आता तब रजिया माँ के पीछे घूमती रहती, वो पढ़ नहीं सकी। वह चूड़ियाँ पहनने की कला जान गयी। रजिया बढ़ती हुई उसके शरीर और स्वभाव में भी बदलाव आया। पहले शहर से आने के बाद दौडकर निकट आके तरह-तरह सवाल पूँछती अब कुछ दिनों बाद सकुँचा रहती। अब वह स्वतंत्र रूप में चूडियों का व्यापार करती। रजिया के सौंदर्य के आकर्षण से बहुओं के पतिदेव दूर से ताकते रहते थे। बहुओं के सामने वह उनका मजाक उड़ाती थी तब वहाँ से पतिदेव भागते थे। इसीतरह रजिया अपने पेशे में निपुण हो रही थी। यह निपुणता रजिया की माँ के पास थी।


लेखक का शहर में रहना बढ़ता गया तबसे रजिया से भेट दुर्लभ होती गयी। एक दिन गाँव में रजिया के साथचुडियों से भरा टोकरा सिर पर लिए नौजवान देखा तो लेखक ने समझ लिया की उसका पति है। लेखक ने मज़ाक से कहा कि, "इस मजूरे को कहाँ से उठा लाई है रे?" तब उन्होंने कहा कि वे उनके पति है। रजिया की माँने बचपन में मजाक से दूल्हे की बात याद आयी। वह भी दिन आ गया कि जब वही लेखक पति बने उसकी पत्नी को चूडियाँ पहनाने रजिया आ गयी उन्होंने खूब धूम मचायी थी।


समय बीतता गया। रजिया और लेखक की भेट पटना शहर में हुयी। रामवृक्ष बेनीपुरीजी एक छोटेसे अखबार के संपादक के रूप में काम करते थे। एक चौक में तभी एक बच्चा आकर कहने लगा बाबू आपको औरत बुला रही है, यह बात सुनकर लेखक को पद प्रतिष्ठा का खयाल आया। यहाँ प्रसिद्ध पान की दूकान में वे पान खा रहे थे। चौक में से लोग इधर-उधर चले जाने के बाद बच्चे ने जहाँ इशारा किया वही पहुँच गये। तभी वहाँ एक स्त्री यानी रजिया ने आकर 'सलाम मालिक' कहा। बातचीत के दौरान समझ गया कि जमाना बदल गया है। चूडियाँ दूल्हनों के साजश्रृंगार की नयी चीजें लेकर आयी थी। रजिया लेखक को रहने का ठिकाना पूँछने लगी तब लेखक अचरज में पड़ गया तभी अधेड उम्र का उसका पति हसन आ गया तो लंबी दाढी, पाच हाथ लम्बा बन गया था। हसन पान लाने के बाद रजिया किस तरह दुनिया बदल गयी है यह बताते हुए कहती है, “अब तो ऐसे गाँव है जहाँ हिंदू मुसलमानों के हाथ से सौदे नहीं खरीदते । अब हिंदू चुडिहारिने हैं, हिंदू दरजी है। " रजिया ने यह भी खुशी की बात बताई, मेरे गाँव में यह पागलपन नहीं है। रजिया के अलावा लेखक की पत्नी किसीसे चूडियाँ लेती नहीं थी। दूसरे दिन रजिया अपने पति को लेकर डेरेपर हाजिर हो गयी। लेखक की पत्नी को देने के लिए चूड़ियाँ देती गयी। लेखक ने रजिया को ही चूड़ियाँ देने की बात कही तब उन्होंने अपने हाथ से पहनाने की बात कही जिसने पति प्रेम की बात बतायी।


काफी समय बाद एक दिन अचानक लेखक रजिया के गाँव में पहुँच गये थे। चुनावी चक्कर का कठिन कार्य था। उस गाव में पहुँचते ही उन्हें रजिया चूडीहारिन की याद आयी। नेता बने लेखक की जय-जयकार हो रही थी। उनको अपने घर में लेने के लिए लोग भाग्य समझते थे। वही नेता स्वर्ण युग संदेश लोगों को सुना रहे थे लेकिन दिमाग में अलग गुत्थियाँ उलझी थी। इतने में ही भीड से छोटी बच्ची रजिया आ गयी, जिस तरह रजिया दिखती है। बीच में चालीस-पैतालीस साल का अंतर ही खत्म हुआ था। तब किसीने कहाँ कि वह ठीक अपनी दादी जैसी है। उन्होंने लेखक का हाथ पकडकर कहाँ, "चलिए मालिक, मेरे घर । "


लेखक रजिया के आंगन में खडा था। छोटा सा घर लेकिन साफ-सुथरा रजिया का पति हसन मर गया था। उनके तीन लड़के थे। बड़ा कलकत्ता में कमाता है, मंझला उनका ही पिढीजात पेशा संभालता है छोटा लडका शहर में पढ़ता है। रजिया जैसी दिखनेवाली बडे लडके की बेटी हैं। उस लडकीने रजिया को आँगन से ही पुकारा, “मालिक दादा आ गये।” रजिया ने पोती को भेज दिया किंतु उन्हें विश्वास नहीं था कि ये बड़े नेता जो मोटार गाडी से चलनेवाले हैं, उनके घर में आऐंगे। उन्होंने बहुओं से कहलाकर बीमारी में पडे मैलेकुचले कपडे बदल दियें। नजदीक आकर लेखक से 'मालिक सलाम' कहा। लेखक को लगता है उसके चेहरे से झुरियाँ चली गई, उसका चेहरा बिजली की तरह चमक उठा है।इस तरह 'रजिया' रेखाचित्र स्मृतिकणों के बेजोड संयोजन का परिणाम है। रेखाचित्र के समाप्त हो जाने के उपरान्त भी हम सब कुछ भूलकर कुछ देर तक उसी रस में तन्मय रहते है। इस व्यक्तिपरख रेखाचित्र में लेखक की अपनी तीव्र अनुभूति तो है साथ ही रजिया की परिवर्तित स्थिति पाठक को एक ऐसे संभ्रम में डाल देती है जिससे उबरने की अपेक्षा वह अधिक अधिक धँसता चला जाता है और लेखक की अनुभूति के साथ तादाम्य कर लेता है।

Monday, 21 June 2021

आलोचक के गुण

 Eknath Patil, [20.06.21 12:00]

T. Y. B. A.  ,  HINDI  , paper no - 13  ,  semester - 06  . साहित्यशास्त्र   ,                 आलोचक के गुण


आलोचक का उत्तरदायित्व तिहरा होता है। एक कवि या लेखक के प्रति, दूसरे कृति के प्रति और तीसरे समाज के प्रति । इन तीनों ही प्रकार के उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए आलोचक में कुछ गुणों का होना अत्यंत आवश्यक है । आलोचक के गुणों पर विचार करने से जो गुण ज्ञात होते हैं, उनमें भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों दद्वारा समन्वित प्रमुख गुण इस प्रकार हैं


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सहृदयता


सहृदयता आलोचक का आवश्यक गुण है। क्योंकि भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार कोई भी व्यक्ति बिना सहृदय हुए काव्य का रसास्वादन नहीं कर सकता। सहृदय होने से ही वह कृति का सही विवेचन कर सकता है। मुक्त हृदय से काव्य-कृति में तन्मय होकर, गुणों पर रीझता हुआ जो आलोचक अपनी आलोचना प्रस्तुत कर सके, वह सहृदय आलोचक है। आलोचक के मन में रचनाकार तथा रचना के प्रति श्रद्धा, सहानुभूति तथा आदर की भावना होनी चाहिए।


विस्तृत ज्ञान -


यदि आलोचक को आलोच्य विषय तथा लोक और शास्त्र का व्यापक एवं सूक्ष्म ज्ञान न होगा, तो वह वर्ण्य विषय की बारीकियों को समझ ही न पाएगा; उसमें गुण-दोष निकालना तो दूर की बात है। आलोचक का इतिहास, दर्शन, काव्यशास्त्र, समाजशास्त्र आदि का विस्तृत ज्ञान ही उसे आलोचना की विविध भूमियाँ प्रदान कर सकता है और कृति की विशेषताओं का विवेचन करने में सहायक हो सकता है। अत: विषय का सांगोपांग विवेचन करने के लिए समालोचक का ज्ञान विस्तृत होना आवश्यक है।


निष्पक्षता


सहृदयता के साथ-साथ निष्पक्षता के मेल के बिना आलोचक किसी कृति की आलोचना में न्याय नहीं कर सकता। परिचितों और आत्मीयों की कृतियों में उसे गुण ही गुण दिखलाई देंगे और अन्यों की कृतियों में दोषअधिक और गुण कम। आलोचक को न्यायाधीश के समान नीर-क्षीर विवेकी होना आवश्यक है। आलोचक का यह गुण उसकी सूक्ष्म बुद्धि और चरित्र दोनों से ही संबंध रखता है। पाश्चात्य समालोचनाशास्त्र में आलोचक के इस गुण को बहुत महत्त्व दिया गया है।


* स्वाभाविक प्रतिभा -


स्वाभाविक प्रतिभा के अभाव में कोई भी आलोचक आलोचना क्षेत्र में कभी भी सफल नहीं हो सकता। स्वाभाविक प्रतिभा के बल पर ही एक आलोचक अपने कथन, निर्णय या मत को सामर्थ्यपूर्ण और प्रभावोत्पादक बना सकता है । इसी कारण हमारे यहाँ काव्योत्पादन और काव्यालोचन दोनों में प्रतिभा को बहुत महत्त्व दिया गया है। हमारे यहाँ प्रतिभा के दो भेद माने गए हैं- कारयत्री और भावयत्री। कारयत्री प्रतिभा का संबंध कवि से होता हैं और भावयत्री प्रतिभा का संबंध भावक या आलोचक से होता है।


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अन्तर्दृष्टि 

आलोचक में अन्तर्दृष्टि का होना बहुत जरूरी होता है। अन्तर्दृष्टि की विशेषता बहुत कुछ जन्मजात कहीं जा सकती है। किंतु शिक्षा और अभ्यास आदि से आलोचक की यह विशेषता विकसित हो सकती है। आलोचक अपनी इसी विशेषता के कारण सच्ची आलोचना में समर्थ हो सकता है; क्योंकि आलोचक का कर्तव्य है कि कवि के द्वारा की गई जीवनाभिव्यक्ति को पाठक तक पहुँचा देना। आलोचक का यह लक्ष्य तभी पूर्ण हो सकता है, जब उसमें सूक्ष्म अंतर्दृष्टि हो। हडसन तथा फेलेट ने आलोचक के इस गुण को काफी महत्त्व किया है।                        शिक्षा और कवित्व शक्ति


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आलोचक को भी कवि के समान शिक्षित होना चाहिए। स्कॉट जेम्स के मतानुसार आलोचक को उसी भूमिका तक पहुँचने की चेष्टा करनी चाहिए, जिस भूमिका पर कवि रहता है। यह तभी हो सकता है, जबकि आलोचक भी कवि के समान शिक्षित हो। हडसन ने भी आलोचक के शास्त्र ज्ञान की अपेक्षा पर जोर दिया है।


अनेक विचारकों ने यह भी माना है कि समालोचक में भी कवि की तरह कवित्व शक्ति होनी चाहिए। बेन जॉनसन ने तो यहाँ तक कहा है कि, "कवियों की आलोचना केवल कवि ही कर सकते हैं; केवल वे ही कवि, जो काव्य-रचना में श्रेष्ठ समझे जाते हैं।"


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वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति का होना


आज की आलोचना के ये आवश्यक उपादान है। पाश्चात्य आलोचना शास्त्र में इनके ऊपर विशेष जोर दिया गया है। वैज्ञानिकता का अर्थ है, वस्तुओं का निष्पक्ष भाव से विश्लेषण । इस प्रकार का विश्लेषण तभी हो सकता है, जब आलोचक स्वभावत: वैज्ञानिक हो। वैज्ञानिकता के साथ-साथ पात्रों के अन्तर्द्वद्व से परिचित होने के लिए आलोचक में मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति का होना भी नितांत आवश्यक है। साहित्य मानव जीवन की अभिव्यक्ति है और आलोचक का कार्य उस साहित्य का मूल्यांकन करना होता है। अतः उसे मानव-मनोविज्ञान का अच्छाअच्छा ज्ञान हो.                                       कवि और उसके काव्य के विषय में पूर्ण ज्ञान -


Eknath Patil, [20.06.21 12:00]

समालोचक का विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है। उसके लिए यह भी आवश्यक है कि वह कवि और उसके काव्य के विषय में सभी कुछ जानता हो। तभी वह आलोच्य कृति की सही आलोचना कर सकता है। समालोचक को अपने सिद्धांतों के आधार पर कृति की समालोचना करने के स्थान पर, आलोच्य कृति के कृतिकार की रूचि तथा परिस्थितियों के आधार पर करनी चाहिए। अतः उनका ज्ञान समालोचक का विशेष गुण है।


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कृतिकार के साथ तादात्म्य -


समालोचक का एक गुण यह भी है कि वह समालोचना करते समय स्वयं को भी उन्हीं परिस्थितियों में अनुभव करे, जिनमें आलोच्य कृतिकार रहा हो। इस तादात्म्य से कृति की गहराई से समालोचना हो सकती है।


* प्रेषण की क्षमता -


आलोचक में अपनी सहानुभूति को दूसरों तक प्रेषित करने की क्षमता होनी अपेक्षित है। उसका कार्य केवल यह नहीं है कि वह स्वयं किसी कलाकृति का आनंद ले; अपितु उस आनंद को पाठकों तक प्रेषित करे। इस संबंध में हेलन गार्डनर ने कहा है, "एक अच्छे आलोचक में अच्छी एवं बुरी कविता का भेद करने की क्षमता का होना उतना आवश्यक नहीं, जितना कि उसके अभिप्रेत सौंदर्य को सहज एवं ग्राह्य शब्दावली में प्रस्तुत करना ।”


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निर्णयात्मक शक्ति -


आलोचक का कर्म निर्णय प्रधान होता है। अतः उसका यह सर्वोपरि गुण है कि वह स्पष्ट और सही निर्णय ले सके। सही विषय-बोध, अपने व्यक्तित्व की सशक्तता एवं अभिव्यक्ति की स्पष्टता से ही समालोचक सही निर्णय ले सकता है।


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अभिव्यक्ति कौशल


यदि समालोचक में अभिव्यक्ति कौशल नहीं है, तो समालोचना स्वयं में प्रभावहीन हो जाएगी। जब समालोचना ही नीरस और प्रभावहीन होगी, तो वह जो निर्णय देगी, उसका पाठकों पर प्रभाव ही क्या पड़ेगा? अतः समालोचक के किए यह भी आवश्यक है कि उसकी अभिव्यक्ति सक्षम हो।


 सहानुभूती                         सहानुभूति आलोचक का आवश्यक गुण है। लौंगफेलो ने इस बात का समर्थन किया है। हमारे यहाँ भी इस तथ्य का समर्थन दूसरे ढंग से किया गया है। किसी ने ठीक ही कहा है - "शिवजी की भाँति बुधजन गुण और अवगुण दोनों ग्रहण करते हैं; किंतु चंद्रमा की भाँति गुणों को सिर पर रख प्रकाशित करते हैं और दोषों को विष की भाँति गले के भीतर ही रखते हैं।" इस लक्ष्य तक आलोचक तभी पहुंच सकता है, जब उसमें सहानुभूति का विशेष गुण हो ।                       औचित्य ज्ञान


आलोचक को किसी रचना के गुण-दोषों के विवेचन में औचित्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हमारे यहाँ तो औचित्य को बहुत महत्त्व दिया गया है। इस प्रकार का औचित्य-ज्ञान उसी समालोचक में हो सकता है, जो सत्यप्रिय और ईमानदार है, जिसमें धीरता और स्थिरता आदि स्वाभाविक गुण हैं, तथा जो स्वभाव से गंभीर है।


छिद्रान्वेषी प्रकृति का निराकरण


यद्यपि काव्य की समालोचना के लिए जब समालोचक प्रवृत्त होता है, उस समय सम्यक विवेचना के लिए गुणों के साथ-साथ दोषों को भी प्रदर्शित करता है; पर इसमें सुधार भावना होनी चाहिए, न कि छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति । टी. राइमर ने कहा है - "किसी श्रेष्ठ कलाकार के दोषों का प्रदर्शन और गुणों पर परदा डालना अच्छे आलोचक का गुण नहीं है। "


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व्यक्तित्व -


आलोचक का व्यक्तित्व विशिष्ट होना चाहिए। व्यक्तित्व प्राय: दो प्रकार के होते हैं - दूसरों से प्रभावित होने वाले और दूसरों को प्रभावित करने वाले। आलोचक का व्यक्तित्व वास्तव में इन दोनों की मध्य कोटि का होना चाहिए । उसका दृष्टिकोण विस्तृत हो, स्वभाव गंभीर हो, विचार उदात्त हो, साथ-साथ सहानुभूति भी हो ।


इन महत्त्वपूर्ण गुणों के अतिरिक्त आलोचक में गुण-ग्राहकता, परिमार्जित एवं परिष्कृत रूचि, साहस, गर्वहीनता, भाषा पर अधिकार, विभिन्न शैलियों का ज्ञान, विश्लेषणात्मक बुद्धि, दार्शनिक वृत्ति आदि अनेक गुणों का होना आवश्यक है । कुछ गुण पाठक से सम्बद्ध हैं, कुछ कवि से तथा कुछ समालोचक से और इन सबके होने से ही समालोचना आदर्श बनती है।

आलोचना स्वरूप और परिभाषा

 (Eknath Patil)

T. Y. B. A. ,  HINDI  , paper no - 13 , semester - 06     आलोचना स्वरूप और परिभाषा   - आलोचना के अर्थ को व्यक्त करने के लिए हिंदी में कई शब्द प्रचलित हैं। इनमे आलोचना, समालोचना और समीक्षा विशेष प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त विवेचना शब्द भी इनका पर्यायवाची हैं। आलोचना का सामान्य अर्थ किसी वस्तु या व्यक्ति के दोषों की चर्चा करना है, किंतु साहित्य के क्षेत्र में इसे थोडे भिन्न एवं व्यापक अर्थ में ग्रहण किया जाता है । आलोचना शब्द 'लोच' धातु में 'आ' उपसर्ग लगने से बना है। 'लोच' का अर्थ है 'देखना' । अत: व्युत्पत्तिपरक दृष्टि से आलोचना का अर्थ हुआ - 'किसी वस्तु या कृति को सम्यक रूप से देखना या उसका मूल्यांकन करना ।' साहित्य में किसी भी साहित्यिक रचना के विवचेन-विश्लेषण, गुण-दोष दिग्दर्शन या नियम के प्रतिपादन तथा उसकी ऐतिहासिक, सामाजिक या मनोवैज्ञानिक व्याख्या को आलोचना के अंतर्गत स्थान दिया जाता है। किंतु कुछ लोग इस शब्द का अर्थ केवल दोष दिखाना ही समझते हैं। इसी दोष के निराकरण के लिए 'आलोचना शब्द में 'सम' उपसर्ग जोड़ा जाने लगा, जिससे 'समालोचना' शब्द बना। इसका अर्थ है - संतुलित दृष्टि से किसी रचना के गुण दोषों का विवेचन। 'समीक्षा' शब्द में भी गुण-दोषों के प्रति समान दृष्टि की अपेक्षा हैं। इस प्रकार शब्दगत अर्थ की दृष्टि से आलोचना की अपेक्षा समालोचना अथवा समीक्षा शब्द अधिक उपयुक्त हैं। किंतु अब तीनों शब्द सामान्यतया समान अर्थ में प्रयुक्त किए जाते हैं।साहित्य या काव्य का सूक्ष्म अध्ययन करके निष्पक्ष दृष्टि से उसके गुण-दोषों का कथन करना 'आलोचना' कहलाता है। लेकिन कुछ लोग रचनात्मक साहित्य के अतिरिक्त साहित्य से संबंधित अन्य समस्त बातों को आलोचना का हिस्सा समझते हैं। वे साहित्यानुसंधान, काव्य का इतिहास और काव्यशास्त्र एवं काव्य-सिद्धांतों को भी आलोचना के अंतर्गत सम्मिलित करते हैं। परंतु यह मत गलत और भ्रांतिपूर्ण है। आलोचना का स्वरूप इन तीनों से भिन्न है, जिसे हम निम्न पंक्तियों में स्पष्ट करेंगे ।अनुसंधान और आलोचना .


अनुसंधान का प्रमुख कार्य अज्ञात तथ्यों की खोज अथवा ज्ञात तथ्यों की नवीन व्याख्या है। जब तक तथ्यों या दृष्टिकोण संबंधी नवीनता न हो, तब तक उसे अनुसंधान की कोटि में नहीं रखा जा सकता। परंतु आलोचना का कार्य किन्हीं मानदंडों के आधार पर विशेषताएं बताना, व्याख्या करना अथवा मूल्यांकन करना है । अत: अनुसंधान की समस्य कृतियाँ आलोचना नहीं हो सकती और न ही आलोचना की समस्त कृतियाँ अनुसंधान हो सकती हैं।


इतिहास और आलोचना


साहित्येतिहास और आलोचना भी एक नहीं है। इन दोनों की प्रक्रियाओं में भिन्नता है । इतिहास का प्रमुख ध्येय कालक्रम में लेखक और कृति की व्यवस्था और उसका स्थूल परिचय है। इसके विपरीत आलोचना ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का ध्यान रखती हुई लेखक के महत्त्व का प्रकाशन, कृति की मूल्यांकन संबंधी विवेचना, कृति की व्याख्या और उसकी विशेषताओं का स्पष्टीकरण करती हैं। ऐतिहासिक आलोचना इतिहास की पृष्ठभूमि ग्रहण करती है, पर वह इतिहास नहीं है। इतिहास तथ्यों के अनुसंधान के अनुसार अपनी व्यवस्था और मान्यताओं में परिवर्तन और संशोधन करता रहता है; अत: आलोचना से अधिक उसका संबंध अनुसंधान से है।


काव्यशास्त्र और आलोचना


काव्यशास्त्र और काव्य-सिद्धांत को भी कुछ लोगों ने आलोचना का एक रूप माना है। परंतु दोनों में अंतर है। काव्यशास्त्र या काव्य-सिद्धांत समस्त काव्य में व्याप्त उसके स्वभाव, सौंदर्य, प्रक्रिया, प्रभाव आदि से संबंधित नियमों और सिद्धांतों का विश्लेषण और विवेचन करता है, तो आलोचना उन सिद्धांतों और नियमों को मानदंड या कसौटी के रूप में स्वीकार करती है। आलोचना निराकार नियमों और सिद्धांतों की खोज नहीं करती, बल्कि कवि की कृति की व्याख्या या मूल्यांकन करती है।


आलोचना की परिभाषा


आलोचना के स्वरूप को स्पष्ट करने की कोशिश अनेक भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने की है। उनमें


से कुछ प्रमुख मत इसप्रकार हैं। -


* एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका


"Criticism is the art of judging the qualities and values of an aesthetic object whether in literature or the fine arts. It involves the formation and expression of judgement.'' अर्थात् आलोचना का अर्थ वस्तुओं के गुण-दोषों की परख करना है, चाहे वह परख साहित्य क्षेत्र में की गई हो या ललित कला क्षेत्र में इसका स्वरूप निर्णय में सन्निहित रहता है।आई. ए. रिचर्ड्स.


रिचर्ड्स ने भी आलोचना का स्वरूप स्पष्ट करते हुए मूल्य निर्धारण को ही उसकी प्रमुख विशेषता स्वीकार किया है। उन्होंने लिखा है- "To set up as a critic is to set up as a judge of values." अर्थात् आलोचक की नियुक्ति करना निर्णायक की नियुक्ति करना है।


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Eknath Patil, [17.06.21 12:14]

कार्लाइल प्रभावशाली समीक्षा के समर्थक थे। उन्होंने आलोचना की परिभाषा देते हुए लिखा है "Literary criticism is nothing and should be nothing but the recital of one's personal adventures with a book." अर्थात् आलोचना पुस्तक के प्रति उद्भूत आलोचक की मानसिक प्रतिक्रिया का परिणाम है।


* •एडिसन - -


इन्होंने आलोचना का अर्थ छिद्रान्वेषण न लेकर सौंदर्योद्घाटन ही लिया है। उनका कथन है - "समालोचक का धर्म कलाकारों के दोष निकालना नहीं है, बल्कि उसका कर्तव्य है, उनकी कृतियों का सौंदर्योद्घाटन करना।"


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कॉलरिज -


एडिसन से मिलता-जुलता ही दृष्टिकोण कॉलरिज साहब का है। उन्होंने लिखा है - "समीक्षा का उद्देश्य साहित्य-निर्माण के नियमों का निश्चितीकरण है, न कि निर्णयात्मक नियमों का संकलन तैयार करना।'


* ब्रयेन्तर


ब्रयेन्तर ने भी आलोचना में निर्णय की प्रधानता स्वीकार कर उसके उद्देश्य के बारे में लिखा है- "इसका प्रमुख उद्देश्य जनता तथा लेखकों की अभिरूचि का संशोधन एवं कला और साहित्य का श्रेष्ठ निर्देशन है।"


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वर्सफिल्ड


“आलोचना कला और साहित्य के क्षेत्र में निर्णय की स्थापना है।"


डॉ. गुलाबराय


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“आलोचना का मूल उद्देश्य कवि की कृति का सभी दृष्टिकोणों से आस्वाद कर पाठकों को उस प्रकार के आस्वाद में सहायता देना तथा उसकी रूचि को परिमार्जित करना एवं साहित्य की गतिविधि निर्धारित करने में योग देना है।"डॉ. श्यामसुंदरदास


"किसी ग्रंथ को पढ़कर उसके गुण-दोषों का विवेचन करना और उस पर अपना मत स्थिर करना आलोचना कहलाता है। यदि हम साहित्य को जीवन की व्याख्या माने तो आलोचना को उस व्याख्या की व्याख्या मानना पड़ेगा।"


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डॉ. सीताराम चतुर्वेदी -


"समीक्षा वह तात्त्विक प्रक्रिया है, जिसमें मनुष्य कुछ दर्शनीय पदार्थ देखने की इच्छा करे और देख चुकने पर उसमें जो द्रष्टव्य है, उसे दूसरों को भी दिखा दे।"


*


डॉ. गोविंद त्रिगुणायत


“सच्ची समालोचना वह है, जिसमें आलोचक इतिहास एवं तुलना का आधार लेकर वस्तु के बाह्य और अंतर दोनों पक्षों की व्याख्या वैज्ञानिक शैली में करता हुआ सिद्धांतों का निर्माण और आलोच्य वस्तु का मूल्यांकन करने का प्रयास करता है।"


आलोचना संबंधी उपर्युक्त परिभाषाओं का यदि ध्यान से अध्ययन करें, तो हमें स्पष्ट अनुभव होगा कि विद्वानों ने आलोचना संबंधी अपने-अपने दृष्टिकोणों के अनुरूप ही उसके स्वरूप की व्याख्या की है। कोई निर्णय को, कोई व्याख्या को, कोई वैज्ञानिक विवेचन को, कोई मनोवैज्ञानिक अध्ययन को तथा कोई सिद्धांत निर्माण को आलोचना का आवश्यक अंग मानता है। वास्तव में ये सभी मत एकांगी हैं। हमारे दृष्टिकोण से आलोचना में तीन बातें मुख्य हैं- (1) अर्थ का स्पष्टीकरण, (2) विषय का वर्गीकरण तथा (3) निर्णय की प्रधानता। आलोचना का उद्देश्य लेखक और पाठक की रूचि का परिष्कार करना है।


आलोचना के संबंध में भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों के मानदंड अलग-अलग हैं। भारतीय विद्वानों ने अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, रस आदि काव्यालोचन के मानदंड प्रस्तुत किए हैं; तो पाश्चात्य विद्वानों ने बिंबवाद, प्रतीकवाद, अभिव्यंजनावाद आदि । भारतीय आलोचना दृष्टि और पाश्चात्य आलोचना दृष्टि में अंतर होते हुए भी तात्त्विक अंतर नगण्य हैं। फिर भी हम यह अस्वीकार नहीं कर सकते कि पाश्चात्य दृष्टिकोण भारतीय दृष्टिकोण से अधिक व्यापक है। जहाँ भारतीय आलोचना हमें एकांगी दिखाई देती है, वहां पाश्चात्य आलोचना सर्वांगपूर्ण है। संभवतः यही कारण है कि आधुनिक भारतीय समीक्षक किसी एक शैली का स्वीकार न कर, दोनों के समन्वित रूप को अपनी आलोचना का आधार बनाते हैं।

भाषाविज्ञान / पदक्रम

 (Eknath Patil)

T. Y. B. A. , HINDI  , paper no - 16 , semester - 06  

 भाषाविज्ञान                              पदक्रम


वाक्य भाषा की-सहज इकाई है । वाक्य दो या दो से अधिक अर्थपूर्ण शब्दों के क्रमबद्ध रचना-समूह को




 1)घोड़ा दौड़ता है।


2) मिलिंद किताब पढ़ता है।पहले वाक्य में 'घोड़ा' और 'दौड़ता है' ये दो अर्थ पूर्ण शब्द निश्चित क्रम से आए है। उसी तरह दूसरे वाक्य 'म 'मिलिद', 'किताब' और 'पढ़ता है' ये तीन शब्द निश्चित रूप से क्रमबद्ध तथा अर्थपूर्ण बन गए हैं। इसीलिए


यह वाक्य कहलाया गया है।


शब्द जब वाक्य में आ जाता है, तब पद बनता है। जैसे 'सैनिक', 'घोड़ा' और 'बैठना' ये तीन अलग अलग शब्द हैं; लेकिन इनसे वाक्य बनाने पर वे पद कहलाए जाते हैं सैनिक घोडे पर बैठता है। इसमें 'सैनिक', 'घोड़े पर', 'बैठता है' ये शब्द नहीं रह चुके, तो वे पद बन गए हैं।


उपर्युक्त उदाहरणों को देखकर पता च है कि वाक्य में प्रयुक्त पदों का निश्चित क्रम होता है। इसे ही वाक्य रचना या पदक्रम कहते हैं। प्रत्येक भाषा में बाक्य रचना अलग-अलग ढंग से की जाती है।


उदा.


राम पुस्तक वाचतो


राम पुस्तक ओदुत्ताने


राम पुस्तकं पठति


अथवा


पुस्तकं पठति रामः ।


Ram reads book.


राम किताब पढ़ता है।


(मराठी)


(कन्नड)


(संस्कृत)


(संस्कृत)


(अंग्रेजी)


(हिंदी)


उपर्युक्त वाक्यों में मराठी, कन्नड तथा हिंदी वाक्यों की रचना समान लगती है, तो अंग्रेजी तथा संस्कृत


वाक्यों में अलग-अलग रचना दिखाई देती है।


मराठी में सामान्य तौर पर कर्ता के बाद कर्म और उसके बाद किया ऐसा क्रम वाक्य रचना में रहता है, तो संस्कृत में यह क्रम बदल दिया तो भी चल सकता है। अंग्रेजी में कर्ता के बाद क्रिया और बाद में कर्म आता है। हिंदी की वाक्य रचना निश्चित है। उसमें प्रथम कर्ता, उसके बाद कर्म और उसके बाद क्रिया ऐसा ही


क्रम रहता है।


यह पदक्रम 'व्याकरणीय' अथवा 'साधारण पदक्रम' कहलाया जाता है। बालंकारिक पदक्रम में अथवा बोलचाल की भाषा में पदक्रम अलग रहता है। उनके नियम निर्धारित करना अत्यंत कठिन है। इसलिए यहां केवल साधारण पदक्रम के नियम दिए जाते हैं।पदक्रम के नियम


1) वाक्य में पहले में कर्ता अथवा उद्देश्य, उसके बाद कर्म या पूर्ति और अंत में क्रिया रखी जाती है ।


उदा. 1) प्रिया होशियार जान पड़ती है।2) उर्मिला गाना गाती है।


3) अरुण क्रिकेट खेलता है।


2) यदि किसी वाक्य में दो कर्म हो, तो गौण कर्म पहले और मुख्य कर्म पीछे आता है।


मैंने अपने मित्र को एक किताब भेंट की। स्नेहा ने अपनी सहेली को पत्र भेजा।


3) प्रधान मंत्री ने अपने मित्र को मंत्री बनाया।                                         3) कर्ता तथा कर्मकारकों के सिवा दूसरे कारकों में आने वाले शब्द उनके संबंधित शब्दों के पूर्व आ जाते हैं।


 उदा. 1) मेरे ससूर की तसबीर चित्रकार ने कई दिनों में भी नहीं बनवाई। देखली से देहरादून तक जाने वाली गाड़ी चार नंबर प्लेट फॉर्म पर खड़ी है।


3) सातारा से मेरे गाँव तक जाने वाली सड़क उबड़-खाबड़ हैं।         4) विशेषण जिस संज्ञा से संबंधित रहता है, उसके पहले आ जाता है। उदा. 1) महान शक्तिशाली सॅमसन की ताकद उसके सुंदर सुनहले बालों में थी। 4)


2) विशाल रंगमंच पर एक कमनीय नर्तकी नाच रही थी।


3) अच्छी पुस्तकें सस्ती नहीं मिलती।


5) क्रिया विशेषण अव्यय अथवा क्रिया विशेषण वाक्यांश सामान्यतः क्रिया के पहले आ जाता है।


उदा. 1) हिरन तेजी से चौकड़ी भरता हुआ दौड़ता है। 2) मनुष्य को सुख-दुःख में समान रहना चाहिए। 3) भाई जरा धीरे-धीरे बोलो।          6) संबंधबोधक तथा उसके अनुसंबंधी सर्वनाम के कर्मादि बहुधा वाक्य के आदि में आते हैं।


उदा. 1) उसके पास एक पुस्तक है, जिसमें क्रिकेट के खिलाडियों के चित्र हैं। 2) 3) जिससे लोग घृणा करते हैं, उस पर परमात्मा प्रेम करता है। • जिसका कोई नहीं होता, उसका खुदा होता है।


7) 'क्या' यह प्रश्नवाचक अव्यय कभी वाक्य के आरंभ में आता है, कभी बीच में, तो कभी अंत में भी आता । है। उदा. 1) क्या तुम कल मुम्बई जा रहे हो ?  2) तुम कल क्या मुंबई जा रहे हों?   3) तुम कल, मुंबई जा रहे हो क्या? प्रश्नवाचक अव्यय 'न' वाक्य के अंत में ही आता है


उदा.


1) आप वहां चलेंगे न ?


2)


पिताजी! आप मेरे स्कूल आयेंगे न ?


3) राजपुत्र तो कुशल से हैं न?


8) 'न', 'नहीं' और 'मत' ये निषेधवाचक अव्यय बहुधा क्रिया के पूर्व ही आ जाते हैं। 'नहीं' और 'मत'क्रिया


के पीछे भी आते हैं।


उदा.


1)


मैं न जाऊंगा।


2) राज आज भी नहीं आया।


3)


तुम मत जाओ।


उसने आपको देखा नहीं। 5)


उसे बुलाना मत।


9) संबंधवाचक क्रियाविशेषण जब तब, जैसे-तैसे, जहाँ-तहाँ आदि बहुधा वाक्य के प्रारंभ में ही आ जाते हैं।


उदा.


1) जैसा बोएंगे, वैसा पाएंगे।


2) जहां गुलाब के फूल खिलते हैं, वहाँ कांटे भी दिखाई देते हैं। 3) जब मैं तुम्हें पुकारूंगा, तब तुम तुरंत भाग आना।


Eknath Patil, [08.06.21 21:54]

10)संबंधसूचक अव्यय जिन शब्दों से संबंधित रहते हैं, उनके पीछे आते हैं। पर, मारे, बिना, सिवा कुछ अव्यय उनके पूर्व भी आते हैं।


उदा.


1) वह चिंता के मारे मरा जा रहा है।


2) बेचारा कपड़ों सहित सो गया।


3)


वह बिना सोचे-समझे बोलता है।


4) वह मारे चिंता के सो नहीं पाता।


11)समुच्चयबोधक अव्यय जिन शब्दों को जोड़ते हैं, उनके बीच में आ जाते हैं।


उदा.


1) बच्चों को मां-बाप के प्रति आदर होना चाहिए क्योंकि माँ-बाप ही उनके लिए कष्ट


उठाते हैं।


2) राम-सीता और लक्ष्मण तीनों चौदह साल तक वनवास चले गए।


3)


ग्रह और उपग्रह सूर्य के आसपास घूमते है।


12)संकेतवाचक समुच्चयबोधक अव्यय 'यद्यपि तथापि' और 'यदि-तो' सामान्यतः वाक्य के प्रारंभ में


आ जाते हैं।


उदा.


यदि जाड़ा लगता है, तो कोट पहन कर जाना। 2) पद्यपि वह छोटा है, तो भी बुद्धिमान है।




13)विस्मयादिबोधक अव्यय तथा संबोधनकारक बहुधा वाक्य के प्रारंभ में ही आ जाते हैं। 1) ओह ! उस गरीब की राम कहानी सुनाई भी नहीं जा सकती!


अरे ! यह अचानक क्या हुआ ?


3) छि:! ऐसी गंदी बातें मुँह से निकालते हुए शर्म नहीं आती तुम्हें ? 4) अरे नटखट ! जरा सुनो तो सही!


14)अधिकरण, अपादान, संप्रदान और करण कारक क्रमशः कर्ता और कर्म के बीच में आते हैं। उदा. 1) राम रथ पर बैठकर नगर से बाहर पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए गए और तीर से रावण को मारा।


15)वाक्य किसी भी अर्थ का क्यों न हो; लेकिन उनके पदों का क्रम हिंदी में प्राय: एक ही सा रहता है। नीचे एक ही वाक्य सभी अयों में दिया है।


1) विधानार्थक वाक्य - राम आम खाता है।


2) निशेधार्थक वाक्य - राम आम नहीं खाता है।


3) प्रश्नार्थक वाक्य - क्या राम आम खाता है ?


4) आज्ञार्थक वाक्य - राम, आम खाओ।


5) इच्छार्थक वाक्य - राम, आम खाये।


6) विस्मयादिबोधक वाक्य -अरे! राम आम खाता है !


7) संदेहार्थक वाक्य - राम ने आम खाया होगा।


8) संकेतार्थक वाक्य -राम आम खाता, तो अच्छा होता ।


(सूचना - बोलचाल की भाषा में पदक्रम के बारे में कुछ निश्तिच नियम नहीं बताएँ जा सकते। संभाषण में


पदक्रम के संबंध में पूर्ण रूप से स्वतंत्रता रहती है।


उदा.






1) बड़ी उमर है तुम्हारी, भाई।


2) करती हूँ कोशिश में, लेकिन बुरा मत कहना तुम मुझे ।

3)


बताते हैं, अभी हम तुमको |


4) बज गए न आऊ, फिर भी उठे नहीं तुम !


आलंकारिक भाषा में भी पदक्रम की स्वतंत्रता रहती है। लेखक अथवा कवि की इच्छा के अनुसार पदक्रम में अंतर पड़ जाता है।)

भाषाविज्ञान का अन्य ज्ञान-विज्ञान से संबंध

(E. S. Patil)

T. Y. B. A. ,HINDI  ,  paper no - 16  ,  semester - 06

  भाषाविज्ञान का अन्य ज्ञान-विज्ञान से संबंध


•भाषाविज्ञान का ज्ञान-विज्ञान की अन्य शाखाओं से नजदीकी संबंध होता है। एक की जानकारी के बिना दूसरे का अध्ययन प्राय: असंभव होता है। अत: इन संबंधों को स्पष्ट करने के लिए हमारे पाठ्यक्रम के अनुसार कुछ प्रमुख संबंध को स्पष्ट किया जा रहा है।


1) भाषाविज्ञान और साहित्य


भाषाविज्ञान और साहित्य का घनिष्ठ संबंध है। भाषाविज्ञान साहित्य के बिना अधूरा है और साहित्य भाषाविज्ञान के बिना अधूरा है । भाषाविज्ञान और साहित्य दोनों में भाषा तत्त्व महत्त्वपूर्ण है। 'भाषा' भाषाविज्ञान का साध्य है, तो साहित्य के लिए 'अभिव्यक्ति' । साहित्य भाषाविज्ञान के लिए सामग्री संकलन करने का कार्य करता है । भाषा के तुलनात्मक एवं ऐतिहासिक अध्ययन में साहित्य की सहायता लेनी पड़ती है। उदाहरण के लिए साहित्य से ही यह पता चलता है कि किस तरह संस्कृत से पालि, पालि से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से हिंदी की उत्पत्ति हुई और खड़ी बोली, ब्रज, अवधी, बघेली, छत्तीस गढ़ी, भोजपुरी आदि बोलियों का प्रादुर्भाव हुआ तथा खड़ी बोली उत्तरोत्तर विकसित होकर राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचलित हुई। लैटिन, ग्रीक, संस्कृत, जर्मन, ईरानी, अवेस्ता आदि भाषाओं के प्राचीन साहित्य के आधार पर ही भाषाविज्ञान यह कहता है कि इन भाषाओं का मूल स्त्रोत एक है तथा ये सभी एक परिवार की भाषाएँ हैं।


जीवित भाषाओं के अध्ययन को छोडकर पुरानी या मृत भाषा का, भाषाविज्ञान चाहे जिस रूप में अध्ययन करना चाहे, उसे बार-बार साहित्य का आश्रय तो लेना ही पड़ेगा। साथ में जीवित भाषा के संबंध में भी 'क्यों', 'कब', 'कैसे' इत्यादि के उत्तर के लिए भाषाविज्ञान को साहित्य का सहारा लेना पड़ेगा।


ध्वनि परिवर्तनों एवं रूप परिवर्तनों को जानने के लिए भी साहित्य भाषाविज्ञान को पर्याप्त सामग्री प्रदान


करता है। अर्थ - परिवर्तन के सम्यक् अध्ययन के लिए भाषाविज्ञान को साहित्य की ही मदद लेनी पड़ती है। जैसे


साहित्य द्वारा ही इस बात का पता लगाया जाता है कि कैसे 'असुर' शब्द पहले देवताओं के लिए प्रयुक्त - किया जाता था । इसी तरह कैसे ‘स्वर्गवास' शब्द देवताओं के निवास के अर्थ को छोड़कर 'मृत्यु' का पर्याय हो गया?


दूसरी ओर साहित्य भी भाषाविज्ञान से विपुल सहायता लेता है। भाषाविज्ञान साहित्य के क्लिष्ट अर्थों एवं विचित्र प्रयोगों तथा उच्चारण संबंधी समस्याओं पर प्रकाश डालता है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने भाषाविज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर जायसी कृत 'पद्मावत' के बहुत से शब्दों को उनके मूल रूपों से जोड़कर उनके अर्थों को स्पष्ट किया है । साथ ही शुद्ध पाठ के निर्धारण में भी इससे पर्याप्त सहायता ली है। इस प्रकार भाषाविज्ञान और साहित्य एक-दूसरे के सहायक हैं।


2) भाषाविज्ञान और व्याकरण -


व्याकरण शब्द 'वि' और 'आकरण' के योग से बना है। व्याकरण शब्द का अर्थ है, 'टुकडे करना' । यहाँ शब्दों के टुकड़े-टुकड़े करके उसके ठीक स्वरूप को बनाना व्याकरण का काम है। व्याकरण और भाषाविज्ञान मेंबहुत घनिष्ठ संबंध है। इसी घनिष्ठ संबंध के कारण दोनों को एक या भाषाविज्ञान को व्याकरण, या व्याकरण को .भाषाविज्ञान मानने का भ्रम लोगों में हो जाता है। इन दोनों में अंतर स्पष्ट है -


भाषाविज्ञान व्याख्यात्मक विषय है, जबकि व्याकरण वर्णनात्मक व्याकरण के द्वारा ही कोई व्यक्ति किसी भाषा का शुद्ध एवं ठीक उच्चारण कर उसे व्यवहार में ला सकता है। किसी भाषा के शुद्ध एवं अशुद्ध प्रयोगों को बताने का कार्य व्याकरण करता है। इसके विपरीत भाषाविज्ञान, विज्ञान होने के कारण इस बात को जानना चाहता है कि कब, कहाँ, कैसा प्रयोग होता है।


जहाँ तक संबंधों का प्रश्न है, भाषा के अध्ययन में दोनों अन्योन्याश्रित हैं। बिना भाषाविज्ञान की जानकारी से अच्छा व्याकरण नहीं लिखा जा सकता और दूसरी ओर भाषाओं के विश्लेषण में भाषाविज्ञान व्याकरण से पर्याप्त सामग्री और सहायता लेता है।


व्याकरण जीवित भाषा का रूप है। भाषा के परिवर्तन को समझने की क्रिया भाषाविज्ञान करता है और व्याकरण उन्हें संभाल लेता है। उदा. व्याकरण यह बतलाता है कि 'जा' का भूतकाल रूप 'गया' होता है। लेकिन यह कहाँ से आया यह भाषाविज्ञान बताता है।


भाषा की साधुता या असाधुता बताने का कार्य व्याकरण करता है। इस दृष्टि से व्याकरण भाषाविज्ञान का अनुगामी है। भाषाविज्ञान नए रूपों का सहज समावेश कर सकता है, लेकिन व्याकरण नहीं। इसलिए व्याकरण पुराणमतवादी है, जबकि भाषाविज्ञान प्रगतिवादी है।


भाषाविज्ञान का कार्य वैज्ञानिक है, तो व्याकरण का कलात्मक व्याकरण का क्षेत्र अत्यंत संकुचित है, जबकि भाषाविज्ञान का क्षेत्र अत्यंत व्यापक एवं विस्तृत है। भाषाविज्ञान और व्याकरण में निम्न भेद हैं. -


1) व्याकरण कला है तो भाषाविज्ञान विज्ञान है।

2) व्याकरण का क्षेत्र सीमित है तो भाषाविज्ञान गहराई, व्यापकता से भरा हुआ है।


3) व्याकरण भाषा के विशिष्ट नियमों को सामने रखता है इसलिए वह वर्णनात्मक है, तो भाषाविज्ञान व्याख्यात्मक है।


4) व्याकरण का कार्य नियम-निर्धारण है, तो भाषाविज्ञान का कार्य भाषा परिमार्जन है।


5) व्याकरण भाषाविज्ञान का अनुगामी है।


6) व्याकरण पुराणमतवादी है, तो भाषाविज्ञान प्रगतिवादी है।


7) भाषाविज्ञान भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन है, तो व्याकरण भाषा की रचना स्पष्ट करता है। निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि भाषाविज्ञान और व्याकरण का पारस्परिक अत्यंत निकटतम (घनिष्ठ) संबंध है।


3) भाषाविज्ञान और समाजविज्ञान


मानव एक सामाजिक प्राणी है । भाषा विचार-विनिमय का सर्वोत्तम साधन है। भाषा आद्यन्त सामाजिकवस्तु है। मनुष्य अपनी भावनाओं, विचारों का आदान-प्रदान भाषा द्वारा करता है। भाषा समाज का दर्पण है और समाज भाषा का अनुचर है । भाषा समाज में ही उत्पन्न होती है और समाज में ही विकसित होती है।" समाज के उत्थान एवं पतन, उन्नति एवं अवनति, असभ्यावस्था एवं सभ्यावस्था आदि का सांगोपांग विवरण समाज विज्ञान में रहता है। भाषा एक सामाजिक संपत्ति है। अत: सामाजिक उत्थान-पतन के साथ-साथ


भाषा का भी उत्थान-पतन होता रहता है, क्योंकि समाज जैसे-जैसे सभ्यता के उत्तरोत्तर विकास के सोपानों पर


चढ़ता जाता है, वैसे-वैसे उनकी भाषा भी विकास की ओर अग्रसर होती है और उसकी ध्वनियों रूपों एवं अर्थों में


भी विकास एवं परिवर्तन के दर्शन होते हैं। इसी भाषा विकास को प्रथम वैदिक संस्कृत, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश,


ब्रज, अवधी, खड़ीबोली आदि में क्रमश: देखा जा सकता है। समाजशास्त्र के अध्ययन से ही भाषाविज्ञान की उन अवस्थाओं का पता चलता है, जिसमें भाषा का विकास होता है। समाजशास्त्र के किन प्रभावों से 'साँप' को कीडा और 'लाश' को मिट्टी कहते हैं? क्यों गाय 'बियाती' है, स्त्री नहीं? इन सब बातों का उत्तर समाजशास्त्र के सूक्ष्म अध्ययन से ही मिल सकता है।


समाज विज्ञान केवल सामाजिक विकास का ही बोध नहीं कराता, अपितु अन्य समाजों के प्रभाव से उत्पन्न सामाजिक रीति-नीति, आचार-विचार, बोलचाल, व्यवहार आदि का विवरण भी प्रस्तुत करता है। वह यह भी बतलाता है कि किस तरह एक विजयी एवं प्रगतिशील समाज की भाषा में प्रचलित शब्द दूसरी पराजित परतंत्र समाज की भाषा पर अपना प्रभाव डाला करते हैं और वह समाज उन्हें किस तरह सहर्ष अपनाने में गौरव का अनुभव करता है। जैसे हिंदी क्षेत्र में पहले माता-पिता, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मौसा-मौसी, भाई-बहन आदि शब्द परिवार में बोले जाते थे, किंतु मुस्लिम समाज के संपर्क में आते ही वालिद अम्मीजान, मियाँ-बीबी आदि शब्द प्रचलित हुए और फिर अंग्रेजी संपर्क में आते ही मम्मी-डैडी, आंटी-अंकल, पापा आदि शब्दों का प्रचार अत्यधिक मात्रा में हो गया। इय प्रकार सामाजिक विकास के साथ-साथ भाषा भी किस तरह विकसित एवं परिवर्तित होती रहती है, इसका स्पष्ट ज्ञान समाज विज्ञान से ही प्राप्त होता है।


भाषा के प्रयोग से विभिन्न शब्द आदरार्थ, (आप) सामान्य, (तुम) अनादारार्थ (तू), मूलत: समाज से ही सम्बद्ध हैं। अत: इनका अध्ययन भाषाविज्ञान समाज शास्त्र के बिना नहीं कर सकता। इसप्रकार भाषाविज्ञान के लिए समाज विज्ञान का होना नितांत आवश्यक है।


4) भाषाविज्ञान और मनोविज्ञान

भाषाविज्ञान और मनोविज्ञान का बहुत गहरा संबंध है। भाषा के माध्यम से मानव अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। भाव निश्चित रूप से मन और मस्तिष्क से निःसृत होते हैं। इस प्रकार भाषाविज्ञान भाषा को सुलझाने के लिए मनोविज्ञान का बहुत सहारा लेने की अपेक्षा करता है। वाक्य विज्ञान और ध्वनि विज्ञान में इनके परिवर्तनों के कारणों और दिशाओं में मनोविज्ञान से सहायता प्राप्त करनी पड़ती है। इसी प्रकार 'अर्थ ' के प्रकरण में मनोविज्ञान सहायक सिद्ध होता है। सीधे शब्दों में, भाषा के अंगों में भाव के स्तर पर प्रयोग होता है और भावों का सीधा संबंध मन और मस्तिष्क से होता है, जिनके ज्ञान के लिए मनोविज्ञान भाषा वैज्ञानिक की सहायता करता है । भाषा की उत्पत्ति, विकास एवं सीखने में, विशेष रूप से बालकों को भाषा सिखाने में मनोविज्ञान हमारीसहायता करता है। दूसरी ओर मनोविज्ञान भी अपनी गुत्थियाँ सुलझाने में भाषाविज्ञान की सहायता लेता है। उदाहरण के लिए पागलों के ऊल-जलूल वाक्यों के विश्लेषण में मनोवैज्ञानिक को भाषाविज्ञान की सहायता लेनी पड़ती है। मनोविज्ञान ने ही यह बतलाया है कि भाषा का रूप शब्दमय और विचारमय दो प्रकार का होता है। अब तो दोनों के आपसी संबंध के महत्व को ध्यान में रखकर भाषा-मनोविज्ञान (Linguistic Psychology) या मनोभाषा विज्ञान (Psycholinguistic) मनोविज्ञान की एक नई शाखा के रूप में विकसित हो गई है।


5) भाषाविज्ञान और इतिहास

इतिहास के अंतर्गत हम जातियों की गाथा, उनके विकास और न्हास का अध्ययन करते हैं। इतिहास काल विशेष से सम्बद्ध भाषा पुस्तकों और शिलालेखों आदि में पाया जाता है। ये साधन, भाषाविज्ञान के लिए सामग्री प्रदान करते हैं। यहाँ इतिहास के तीन रूपों को लेकर भाषाविज्ञान के साथ परस्पर संबंध का निरूपण किया जा रहा है


(क) राजनीतिक इतिहास


किसी अन्य देश का राज्य किसी देश पर होने से उस देश की भाषा भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। भारत पर मुसलमानों एवं अंग्रेजों के राज्य होने के कारण हजारों की संख्या में फारसी और अंग्रेजी के शब्दों का हिंदी में प्रवेश इस बात का स्पष्ट प्रमाण है। इसके विपरीत अंग्रेजी आदि में भी अनेक हिंदी शब्दों का ग्रहण हुआ है। इसी प्रकार हिंदी में अरबी, तुर्की और पुर्तगाली शब्दों आदि के आगमन के कारण जानने के लिए राजनीतिक इतिहास से सामग्री प्राप्त होती है। इनसे एक-दूसरे के राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों का ज्ञान प्राप्त होता है। अत: कहा जा सकता है भाषाविज्ञान और राजनीतिक इतिहास का घनिष्ठ संबंध है और दोनों ही एक दूसरे के अध्ययन में सहायता पहुंचाते हैं।


 ( ख) धार्मिक इतिहास


धर्म के रूप परिवर्तन का भी भाषा पर प्रभाव पड़ता है। भारत में हिंदी-उर्दू समस्या धर्म या सांप्रदायिकता के कारण ही है। इधर वैदिक कर्म-कांड या 'यज्ञ' आदि का लोकधर्म से समाप्त हो जाने के कारण अनेक शब्द जो .कभी प्रचलित रहे होंगे, आज अज्ञात हैं। व्यक्तिवाचक नामों को भी धर्म प्रभावित करता है, या फिर बँगला और मराठी में ब्रज भाषा शब्दों के प्रवेश का भी यही कारण हैं। धर्म के कारण ही अनेक बोलियाँ महत्त्वपूर्ण होकर भाषा बन जाती हैं। इसके उदाहरण मध्ययुगीन ब्रज एवं अवधी बोलियाँ हैं। दूसरी ओर धर्म की अनेक समस्याओं को हल करने में भाषाविज्ञान सहायक सिद्ध होता है। दो देशों के एक-दूसरे पर धार्मिक प्रभाव के अध्ययन में धर्म संबंधी शब्द बड़े सहायक सिद्ध होते हैं। इस प्रकार भाषाविज्ञान और धार्मिक इतिहास एक-दूसरे के सहायक बनकर हमारे सामने आते है।    (ग) सामाजिक इतिहास


सामाजिक परंपराओं, रूढ़ियों और व्यवस्था का प्रभाव भाषा पर पड़ता है; साथ ही, भाषा सामाजिक इतिहास पर प्रकाश डालती है। हम कह सकते हैं कि प्राचीन साहित्य में पति-विहीन स्त्री के लिए 'विधवा' शब्दका पाया जाता और पत्नीविहीन पुरुष के लिए कोई शब्द न मिलना, तत्कालीन समाज में स्त्री के लिए पक्षपातपूर्ण व्यवस्था का द्योतक है । इससे एक तथ्य सामने आता है कि विधवा के लिए पुनर्विवाह की व्यवस्था न थी किंतु पत्नी विहीन पति के लिए शब्द न मिलना पुनर्विवाह हो जाने की व्यवस्था का ही सूचक है। प्रागैतिहासिक खोजों के लिए भाषा कई-कई प्रकार से नए आयाम खोलती हैं, जैसे- भारोपीय परिवार की भाषाओं के अध्ययन के आधार पर भारोपीय मूल निवासियों के जीवन पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। संस्कृत या अंग्रेजी में मौसी, बूआ आदि के लिए स्वतंत्र शब्द मिलते हैं, किंतु मौसा, फूफा आदि के लिए कोई शब्द न मिलना इस बात का परिचायक है कि तत्कालीन कौटुम्बिक व्यवस्था में 'मौसा', 'फूफा' आदि के लिए परिवार में विशेष स्थान प्राप्त न था। इसलिए इन शब्दों की उस समय विशेष आवश्यकता भी न थी। बाद में, आवश्यकतानुसार ये शब्द बना लिए गए हैं। इस प्रकार 'भाषाविज्ञान और इतिहास का घनिष्ठ संबंध है।


6) भाषाविज्ञान और भूगोल -


भाषाविज्ञान और भूगोल का गहरा संबंध है। भूगोल भाषाविज्ञान के लिए बड़ी मनोरंजक सामग्री प्रस्तुत करता है; जैसे - नदियों, नगरों, देशों आदि के नामों के रूप में सामग्री देना। भूगोल के आधार पर बहुत से पेड़ पौधे आदि अस्तित्व में होने के कारण अनेक नए नाम हमारे सामने आते हैं। उनके लोप हो जाने पर ये नाम भी लोप हो जाते हैं, जैसे- 'सोमलता' का नाम शायद इसीलिए जीवित भाषा में न हो। इसी प्रकार क्षेत्र के आधार पर जानवर, पक्षी, अन्न आदि के नामों का विकास होता है। क्षेत्र और उसके आकार एवं प्राकृतिक दशाएँ - नदी, पहाड़ आदि बाधाएँ भाषा के प्रसार में बाधक बनती हैं। यही कारण है कि जंगली और पहाड़ी जातियों में अनेक नवीन बोलियों का प्रसार हो जाता है। इसका कारण उनका आपस में न मिल सकना या कम मिलना है। अर्थ विचार में भी भूगोल भाषाविज्ञान की सहायता करता है। 'उष्ट्र' का अर्थ 'भैंसा' से ऊँट कैसे हो गया या 'सैंधव' का अर्थ 'नमक' ही क्यों हुआ; आदि समस्याओं पर विचार करने के लिए भूगोल की सहायता की अपेक्षा होती है। कुछ लोग उच्चारण अवयवों की विभिन्नता का कारण भौगोलिक मानते हैं, जो आधुनिक युग में अधिक उपयुक्त नहीं जान पड़ता । इधर ‘भाषा-भूगोल’ शाखा तो भूगोल के और भी निकट है और इसकी अध्ययन पद्धति भी भूगोल की पद्धति पर ही बहुत कुछ आश्रित है। तुलनात्मक अध्ययन के लिए भूगोल से पर्याप्त सामग्री प्राप्त होती है। दूसरी ओर भूगोल के प्रागैतिहासिक अध्ययन के लिए भाषाविज्ञान भी भूगोल की सहायता करता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भाषाविज्ञान मानव द्वारा अविष्कृत विभिन्न शास्त्रों एवं विज्ञानों से अपने अध्ययन की सामग्री ग्रहण करता है और उन्हें प्रभावित करता है। डॉ. मनमोहन गौतम के शब्दों में, "भाषाविज्ञान का सूक्ष्म से सूक्ष्म विज्ञान, मनोविज्ञान से लेकर ठोस भौतिक विज्ञान तक से प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध अवश्य है। इसका एक कारण है और वह यह कि भाषा मनुष्य की भाव अथवा विचाराभिव्यक्ति की शक्ति है। वाणी मनुष्य की चेतना का प्रतीक है । अरूप भावों को शब्द अथवा ध्वनि रूप देने का श्रेय उसी को है। इसीकारण समस्त ज्ञान विज्ञान की एक मानव के मस्तिष्क तथा प्रेषणीयता उसी के द्वारा संभव है। अत: भाषा को ही अध्ययन का विषय बनाने वाले भाषाविज्ञान का संबंध सभी विज्ञानों से होना स्वाभाविक है।"

भाषाविज्ञान के प्रधान अंग

 (Eknath Patil)

T. Y. B. A. , HINDI  ,  paper no - 16  ,semester - 06 

भाषाविज्ञान के प्रधान अंग


भाषाविज्ञान भाषा का सर्वांगीण अध्ययन प्रस्तुत करता है। अत: उसमें भाषा के सभी घटकों का अध्ययन होता है। 'भाषा' शब्द के द्वारा उसके मुख्य चार घटकों का बोध होता है। ये चार घटक ही भाषाविज्ञान के प्रधान अंग हैं।


1) safa fasta (Phonetics)


3) वाक्य विज्ञान (Syntax)


2 ) पदविज्ञान / रूप विज्ञान (Morphology )


4) अर्थविज्ञान (Semantics)


इसके अतिरिक्त डॉ. भोलानाथ तिवारी ने भाषाविज्ञान के और दो अंग बताए हैं


1) शब्द विज्ञान (Wordalogy) 2) प्रोक्ति विज्ञान (Discoursology)


भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि है। ध्वनि का ही सर्वप्रथम उच्चारण होता है। अनेक ध्वनियों के समुदाय से शब्द बनता है । अनेक पदों की रचना से वाक्य बनता है और वाक्य से पूरे अर्थ की प्रतीति होती हैं। इनमें से प्रत्येक अंग का भाषाविज्ञान के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है।1.ध्वनि विज्ञान  

(Phonetics) -


ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत ध्वनियों का विभिन्न दृष्टियों से अध्ययन किया जाता है। भाषा के अंदर ध्वनि का बहुत महत्त्व है । वस्तुत: ध्वनि भाषा की लघुत्तम इकाई है, जिसका पुनः विभाजन नहीं किया जा सकता। मानव ध्वनि को 'स्वन' भी कहते हैं। ध्वनि -समूह से ही भाषा का निर्माण होता है। ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत उन्हीं ध्वनियों का अध्ययन होता है, जिनके संयोग से भाषा का निर्माण होता है।

ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत ध्वनियों का विभिन्न दृष्टियों से अध्ययन किया जाता है। भाषा के अंदर ध्वनि का बहुत महत्त्व है । वस्तुत: ध्वनि भाषा की लघुत्तम इकाई है, जिसका पुनः विभाजन नहीं किया जा सकता। मानव ध्वनि को 'स्वन' भी कहते हैं। ध्वनि -समूह से ही भाषा का निर्माण होता है। ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत उन्हीं ध्वनियों का अध्ययन होता है, जिनके संयोग से भाषा का निर्माण होता है।) .ध्वनियों के साथ-साथ इनके उच्चारण स्थान का भी अध्ययन ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत होता है। ध्वनियों का उच्चारण जिन अंगों से होता है, उन्हें समग्र रूप से 'वाग्यंत्र' कहते हैं। ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत इस बा की रचना, इसके विभिन्न अंगों के कार्य आदि का अध्ययन किया जाता है। वाग्यंत्र के कई अंग होते हैं, जिनसे विभिन्न ध्वनियों का उच्चारण होता है। जैसे- ओष्ठ्य अंग से 'प' वर्ग की ध्वनियों का, कण्ठ अंग से 'क' बुर्ग की ध्वनियों का उच्चारण होता है।


ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत ध्वनियों में जो विभिन्न प्रकार के परिवर्तन होते हैं, उनके कारणों और दिशाओं का भी अध्ययन किया जाता है। इन कारणों और दिशाओं के अध्ययन का आधार वैज्ञानिक होता है। अर्थात् सम्यक रूप से यह अनुशीलन होता है कि, ध्वनि परिवर्तन के इन कारणों और दिशाओं का आधार क्या है? इन परिवर्तनों का रूप क्या होता है?


ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत ध्वनि संबंधी एक और महत्वपूर्ण विषय का अध्ययन होता है, जिसका नाम


'ध्वनि नियम' है। ये ध्वनि नियम विभिन्न प्रकार के ध्वनि परिवर्तनों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। इसके


अंतर्गत इस बात का अध्ययन होता है, कि इन नियमों का संबंध किस भाषा से है ? किस काल विशेष से है और


इनका कार्य किन सीमाओं के अंदर रहकर संपादित होता है? उदाहरण के लिए ग्रिम नियम को लिया जा सकता है।


इस तरह ध्वनि विज्ञान का समकालिक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन होता है।


ध्वनि अध्ययन के तीन प्रमुख आधार हैं- उच्चारण, प्रसरण या संवहन तथा श्रवण। इसी आधार पर ध्वनि विज्ञान की मुख्यतः तीन शाखाएँ मानी जाती हैं- (1) औच्चरणिक ध्वनि विज्ञान - इस शाखा में उच्चारण और उससे सम्बद्ध बातों का अध्ययन होता है। (2) सांवहनिक या प्रासरणिक ध्वनि विज्ञान इस ध्वनि विज्ञान की शाखा में उच्चारण के फलस्वरूप बनने वाली ध्वनि-लहरों का अध्ययन होता है। इस अध्ययन में प्रायः कायमोग्राफ, स्पेक्टोग्राफ, अॅसिलोग्राफ आदि यंत्रों का प्रयोग होता है। (3) श्रावणिक ध्वनि विज्ञान इस शाखा में ध्वनियों की श्रवण प्रक्रिया का अध्ययन होता है। इस प्रकार उच्चारण, संवहन और श्रवण तक का अध्ययन ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत आता है।

2)   पद विज्ञान या रूप विज्ञान

इसे 'रूप विचार' या 'पद रचना शास्त्र' भी कहते हैं। 'ध्वनि' भाषा की लघुत्तम इकाई है। ध्वनियों के समूह से शब्द का निर्माण होता है तथा शब्दों के समूह से वाक्य का, और सार्थक वाक्यों के समुच्चय से भाषा का निर्माण होता है। परंतु शब्द तथा वाक्य के मध्य रचना प्रक्रिया की दृष्टि से एक और सीढ़ी है, जिसका नाम 'पद' है। ‘पद' शब्द का सीधा अर्थ है पैर। पैर का काम है चलना। एक प्रकार से हम यह कह सकते हैं कि जब मूल शब्द वाक्य में चलने लगता है, अर्थात एक निश्चित अर्थ देने लगता है, तब वह पद बन जाता है। इस प्रकार वाक्य केवल होना चाहिए। इसके लिए शब्दों में प्रत्यय, विभक्तियाँ आदि जोड़ते हैं। जब मूल शब्द में प्रत्यय, विभक्ति आदि के शब्दों का समूह मात्र ही नहीं होता; अपितु उन शब्दों में एक निश्चित अर्थ बोध के लिए, परस्पर संबंध भी स्थापित


योग से विकार उत्पन्न हो जाता है, तब उसे पद कहा जाता है। उदाहरण के लिए 'राम', 'रावण', 'बाण', 'मारा' इन चार शब्दों को ले सकते हैं। इन शब्दों का अपना एक निश्चित अर्थ है, जो मूलार्थ है । यदि परिवर्तन किए बिनाही हम इन शब्दों से वाक्य बनाना चाहे तो असफल रहेंगे। इनके पारस्परिक संबंध को दर्शन के लिए इन शब्दों में परिवर्तन कर हम एक पूर्ण वाक्य बना सकते हैं; जैसे, राम ने रावण को बाण से मारा। इससे वाक्य में प्रयुक्त शब्दों का पारस्परिक संबंध स्पष्ट होता है। इस वाक्य में राम, रावण, बाण, मारा जैसे शब्द 'अर्थतत्त्व कहलात हैं, तथा ने, को, से जैसे विभक्ति चिह्न तथा 'आ' जैसे प्रत्यय 'संबंध तत्त्व' कहलाते हैं। इस प्रकार अर्थतत्त्व तथा संबंध तत्त्व के योग से बना शब्द 'पद' कहलाता है। भाषा विज्ञान की इस इकाई के अंतर्गत भाषा के वैयाकरणिक रूपों के विकास, कारण तथा धातु, उपसर्ग, प्रत्यय, विभक्ति आदि का अध्ययन किया जाता है। लिंग, वचन, काल आदि से संबंधित परिवर्तनों का अध्ययन भी इसी के अंतर्गत होता है। रूप निर्माण प्रक्रिया भी इसके अंतर्गत आती है। रूप परिवर्तनमूलक तथा व्युत्पत्तिमूलक परिवर्तनों का अध्ययन भी इसी के अंतर्गत होता है। यह अध्ययन समकालिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक तीनों ही प्रकार का हो सकता है। 

 3) वाक्य विज्ञान ( Syntax)भाषा का कार्य विचार-विनिमय है, जिसका माध्यम वाक्य है। भाषा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग वाक्य ही है। भाषाविज्ञान में वाक्य के अध्ययन के विभाग को 'वाक्य-विज्ञान' या 'वाक्य-विचार' कहा जाता है। इस विभाग के अंतर्गत वाक्य की संरचना, उसके आवश्यक उपकरण आदि का मनोवैज्ञानिक और सूक्ष्म अध्ययन होता. है। यह अध्ययन करते समय भाषा में वाक्य प्रयोग की स्थिति और उसके अर्थ पर भी विचार किया जाता है।


वस्तुत: विविध पदों से वाक्य का निर्माण होता है। वाक्य विज्ञान के अंतर्गत वाक्य का पद विन्यास संबंधी अध्ययन एवं विवेचन होता है। वाक्य सार्थक होता है और सार्थक वाक्यों से भाषा की रचना होती है। इस प्रकार किसी भी वाक्य के अंदर दो मुख्य बातें निहित होती है, जिन्हें उद्देश्य और विधेय के रूप में जाना जाता है। वाक्य में जिसके विषय में कुछ कहा जाता है, उसे उद्देश्य कहते हैं और उद्देश्य के बारे में जो कुछ कहा जाता है, उसे ‘विधेय’ कहते हैं। जैसे - ‘राम पुस्तक पढ़ता है।' इस वाक्य में 'राम' उद्देश्य है, और 'पुस्तक पढ़ता है' यह विधेय है । इन दोनों का सम्यक् अध्ययन वाक्य विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है, जिससे वाक्य की संरचना और उसके अर्थ विशेष को समझने में सरलता रहती है।


वाक्य विज्ञान के अंतर्गत वाक्य के प्रकारों का भी अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन का आधार वैज्ञानिक होने के कारण यह पूर्ण और सुस्पष्ट होता है। वाक्य विज्ञान के अंतर्गत वाक्य की रचना, पदों का महत्व, पदान्वय, वाक्य के भेद, परिवर्तन के कारण और दिशाएँ, केंद्रिकता आदि का सम्यक्, सूक्ष्म और पूर्ण अध्ययन एव विवेचन होता हैं। इसके तीन रूप हैं- (i) समकालिक, (ii) ऐतिहासिक (ii) तुलनात्मक ।


4) अर्थ विज्ञान (Semantics)

अर्थ भाषा का आंतरिक पक्ष है, जिसे 'आत्मा' की संज्ञा दी जाती है। भाषा सार्थक व्यवस्था होने के कारण उसकी प्रयोजनीयता अर्थ के द्वारा ही संभव है। कुछ विदेशी विद्वान, जिनमें अमेरिकी अग्रगण्य हैं, अर्थ को भाषाविज्ञान का विषय न मानकर दर्शन अथवा मनोविज्ञान का विषय मानते हैं। लेकिन ऐसा मानने का तात्पर्य ध्वनियों को निरर्थक मान लेना होगा। किंतु ऐसा मान लेना भी सार्थक नहीं है; क्योंकि संप्रेषणीयता भाषा कीसर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। दूसरे, ध्वनि, वाक्य, रूप और शब्द भाषा के शरीर मात्र का कार्य करते हैं। उसकी आत्मा तो 'अर्थ' ही हैं, जिसके अध्ययन के बिना भाषा का अध्ययन अधूरा-सा ही रह जाएगा। साथ ही रही है। इससे समाज मनोविज्ञान के साथ अर्थ और उसके विकास के कारण आदि जुड़े हैं। शब्दों के अर्थ और उसके परिवर्तन के कारण, अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ, अर्थ और ध्वनि का संबंध, पर्याय, विलोमता आदि का समकालिक, तुलनात्मक, ऐतिहासिक दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है। इसके अन्य नाम 'अर्थ-विचार' और 'अर्थ 'उद्बोधशास्त्र' भी हैं।


5) शब्द विज्ञान (Wordalogy)

यह विभाग परंपरा से हटकर डॉ. भोलानाथ तिवारी ने ही किया है। देश-विदेश के अन्य विद्वानों ने रचना के अंतर्गत ही शब्दों पर विचार किया है; किंतु शब्दों का वर्गीकरण किसी भाषा के शब्द समूह में परिवर्तन के कारण एवं दिशाएँ, शब्द समूह, कोश विज्ञान और व्युत्पत्तिशास्त्र इसी विभाग के अंग हैं। व्युत्पत्तियों के अध्ययन के समय शब्दों का तुलनात्मक एवं ऐतिहासिक अध्ययन भी किया जाता है।


6) प्रोक्ति विज्ञान (Discoursology)

किसी बात को कहने के लिए प्रयुक्त वाक्यों के समुच्चय को 'प्रोक्ति' कहते हैं, जिसमें एकाधिक वाक्य आपस में सुसंबद्ध होकर अर्थ और संरचना की दृष्टि से इकाई बन गए हों। अंग्रेजी शब्द 'डिस्कोर्स' के लिए प्रतिशब्द के रूप में हिंदी में 'प्रोक्ति' शब्द का प्रयोग हो रहा है। प्रोक्ति के अध्ययन के लिए भोलानाथ तिवारी जी ने हिंदी में 'प्रोक्तिविज्ञान' और अंग्रेजी में 'डिस्कोर्सालोजी' नाम दिया है। भारतीय काव्यशास्त्री प्रोक्ति के लिए 'महावाक्य' का प्रयोग प्राचीन काल में करते थे। आधुनिक युग में समाज भाषा विज्ञान के विकास के कारण प्रोक्ति की ओर लोगों का ध्यान अब गया है।


अर्थ और संरचना आदि सभी दृष्टियों से विचार करने पर प्रोक्ति ही भाषा की मूलभूत सहज इकाई ठहरती है, यह तिवारी जी का मत है। क्योंकि समाज में विचार विनिमय के लिए प्रोक्ति का प्रयोग किया जाता है । प्रोक्ति का विश्लेषण करने पर वाक्य मिलते हैं। उदाहरण के लिए, “लंका के अत्याचारी राजा रावण अयोध्या के राजकुमार राम की पत्नी सीता को उठाकर अपने रथ पर बिठाकर ले गया। पता चलने पर राम और उनकी सेना ने उस पर चढ़ाई की । युद्ध में रावण पक्ष के काफी लोग मारे गए। अंत में वही हुआ, जो होना था। राम ने रावण को बाण से मारा और रावण वीरगति को प्राप्त हुआ।" यह एक प्रोक्ति है, जिसमें कई वाक्य हैं; जैसे - युद्ध में रावण पक्ष के काफी लोग मारे गए या राम ने रावण को बाण से मारा आदि। ये सभी वाक्य आपस में सुसम्बद्ध हैं।


'प्रोक्तिविज्ञान' भाषाविज्ञान की वह शाखा है, जिसमें प्रोक्ति का अध्ययन-विश्लेषण किया जाता है। यह अध्ययन भी समकालिक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक, सैद्धांतिक रूप में हो सकता है।

भाषाविज्ञान की वैज्ञानिकता


T. Y. B. A., HINDI  , Paper no -16 , semester - 06                          

भाषाविज्ञान की वैज्ञानिकता 


भाषाविज्ञान की वैज्ञानिकता पर विचार करने के पूर्व विज्ञान तथा कला की विशेषताओं पर एक नज़र डालकर उसके आधार पर हम यह देखने की कोशिश करेंगे कि भाषाविज्ञान विज्ञान है या कला ? और अगर वह विज्ञान है तो क्यों और किस सीमा तक विज्ञान है? निम्न मुद्दों में इसे आसानी से स्पष्ट किया जा सकता है।


1) विज्ञान की विशेषताएँ


"किसी भी वस्तु का विशिष्ट अथवा युक्तिसहित ज्ञान प्राप्त करना ही विज्ञान है।" विज्ञान अपने आप में कोई विषय नहीं, बल्कि एक दृष्टि है, ज्ञान की विशिष्ट पद्धति है। 'विज्ञान' शब्द अंग्रेजी के साईस (Science) का पर्याय है। उसका मूल अर्थ True Knowledge होता है। याने विज्ञान का ज्ञान सत्य, ध्रुव निश्चय तथा अटल सत्य होता है । समुचित रूप में विज्ञान का अर्थ किसी वस्तु का सम्यक परीक्षण करना, कारणों का पता लगाना, तुलना करना तथा प्रयोग के द्वारा सिद्धान्त निश्चित करना है।


उसी ज्ञान को विज्ञान कहते हैं, जिसमें विकल्प की गुंजाईश नहीं होती, मन की स्थिति विकल्प रहीत हो जाती है। जैसे अमुक कारण हो तो अमुक कार्य होगा ही। ।


विज्ञान के नियम और सत्य सर्व देशव्यापी और सर्व कालव्यापी (सार्वदेशिक और सार्वकालिक) होते हैं । उदा. पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का नियम भारत तथा यूरोप में समान रूप से लागू होता है। तथा पृथ्वी सूर्य क चारों ओर चक्कर लगाती है तथ्य सब कालों में एक ही रहेगा। मतलब विज्ञान के मूलतत्त्व सर्वत्र समान लागू होते हैं।विज्ञान की दृष्टि विश्लेषणात्मक होती है। विज्ञान का उद्देश्य ज्ञानार्जन होता है। विज्ञान केवल सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है। सत्य का अन्वेषण करता है। और भौतिक सत्य को प्रस्थापित करता है। विज्ञान में निश्चयात्मकता होती है। वैज्ञानिक अध्ययन में समान सामग्री से समान निर्णय निकलना संभव है।


वैज्ञानिक अध्ययन का उद्देश्य केवल उत्कंठा की तृप्ति होता है। इस दृष्टि से विज्ञान के लिए विषय साध्य होता है। वह ईश्वर या प्रकृति की कृतियों का विश्लेषण करता है, मानवीय कृतियों का नहीं । विज्ञान सामग्री प्रधान विषय है। इसमें व्यक्तिगत रूचियों का कोई स्थान नहीं। विज्ञान शुष्क होता है। विज्ञान के निर्मित नियम तात्त्विक दृष्टि से अपवाद रहित होते हैं। कारण ये नियम तथा निष्कर्ष वृद्धि के द्वारा किए गए सूक्ष्म प्रयोगों से निश्चित किए जाते हैं।


2.कला की विशेषताएँ -


कला विज्ञान से भिन्न है। कला के मानदण्ड देश-काल के अनुसार परिवर्तित होते हैं। कला में व्यक्ति की अभिरूचि का याने वैयक्तिकता का बड़ा हाथ रहता है। मतलब कला व्यक्तिनिष्ठ एवं तद्नुसार विशिष्ट है। कला में यह निर्धारित नहीं किया जा सकता कि अमुक तत्वों के संयोग से अमुक प्रकार की कला का उद्भव होता है। कला सौंदर्यानुभूति पर प्रतिष्ठित होती है। विज्ञान और कला के सत्य में अंतर होता है। कला का उद्देश्य मनोरंजन होता है। वह उपयोगी भी होती है।


कला में भाव को महत्व मिलता है और वह व्यक्ति की अभिव्यक्ति बन जाता है। वह मानव स्वभाव के अनेक पहलुओं को देखकर मानव के भावना जगत् के सत्य का उद्घाटन करती है। कला रचनात्मक होती है। कला में सामान्य नियमों का निर्धारण नहीं होता। जो नियम बनाए जाते हैं, उसमें अनेक अपवाद होते हैं। कला का संबंध हृदय से है। अतः वृद्धि की अपेक्षा भावना के अधिक निकट है। कला में कल्पना को महत्वपूर्ण स्थान होता है। सौंदर्य और आनंद उसका लक्ष्य होता है। कला रूचि प्रधान होती है, इसलिए एक ही विषय से सम्बन्धित सामग्री द्वारा विभिन्न रूचि वाले कलाकारों द्वारा विभिन्न रचनाएँ सम्भव हैं। उदा. अनेक कलाकार एक ही पौधे को अपनी-अपनी रूचि के अनुरूप विभिन्न प्रकार से चित्रित कर सकते हैं। कला के लिए कोई भी विषय साधन होता है, साध्य नहीं। कला सर्वथा मानवीय कृति है।


उपर्युक्त विवेचन से विज्ञान और कला का अन्तर स्पष्ट हो जाता है। और यह भी स्पष्ट हो जाता है कि भाषाविज्ञान कला नहीं, बल्कि विज्ञान है। किन्तु देखना यह है कि भाषाविज्ञान अन्य विज्ञानों की तरह शुद्ध विज्ञान है या कुछ भिन्न हैं।


3) भाषाविज्ञान की वैज्ञानिकता


विज्ञान का प्रमुख लक्षण है, पदार्थों में कार्यकारण सम्बन्ध की स्थापना करना। याने किसी कारण विशेष के उपस्थित रहने पर ही कार्य होता है। विज्ञान इस बात की खोज करता है कि अगर कोई घटना घटती है तो उसका कारण क्या है? कार्यकारण भाव के विश्लेषण से बिखरी हुई वस्तुओं और असम्बद्ध घटनाओं में एकसंगति या तारतम्य स्थापित होता है। भाषाविज्ञान में बिखरी हुई सामग्री को एकत्र करके उसका विश्लेषण करने इसी प्रकार की व्यवस्था और सम्बद्धता स्थापने का प्रयत्न होता है। जैसे कोई ध्वनि किसी विशिष्ट दिशा में ही क्यों परिवर्तित होती है, इसके कारण की खोज करते हैं और कार्यकारण सम्बन्ध से ध्वनि परिवर्तन की व्यवस्था स्पष्ट करते हैं। अत: विज्ञान का मूलाधार कार्य कारण भाव भाषाविज्ञान में भी होता है।


विज्ञान का दूसरा प्रमुख लक्षण है प्रयोग चिंतन और विचार के पश्चात् प्रयोग द्वारा वैज्ञानिक विश्लेषण को प्रामाणिक बनाया जाता है। भाषा के लिए भी प्रयोग किए जाते हैं। ध्वनिशास्त्र की प्रयोगशाला में ध्वनिसंबंधी प्रयोग किए जाते हैं। किसी भाषा की ध्वनियों के लक्षणों का पता प्रयोग से ही लग जाता है। भाषा की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए शिशुओं पर अनेक प्रयोग हुए हैं। मिस्त्र के राजा सैमेटिकस, अकबर बादशाह, फ्रेडरिक द्वितीय और स्कॉटलैंड के जेम्स चतुर्थ ने इस प्रकार के प्रयोग किए थे।


तीसरा लक्षण है विज्ञान में विकल्प नहीं होते। विज्ञान का परिणाम सार्वकालिक और सार्वत्रिक होता


है। विज्ञान के प्रयोग हम कहीं भी करें, हमें एक से ही परिणाम प्राप्त होते हैं। कुछ लोगों के अनुसार भाषाविज्ञान


में यह लक्षण लागू नहीं होता। वे कहते हैं ध्वनिपरिवर्तन के नियम सभी भाषाओं में एक से नहीं होते। किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि विभिन्न भाषाएँ अलग-अलग होती है, और उन सब पर एक ही नियम कैसे लागू हो सकता है? ध्वनिपरिवर्तन के कारण सभी भाषाओं में एक से हो सकते हैं; परन्तु ध्वनिपरिवर्तन के परिणाम भी सभी में एक से हों, यह कैसे हो सकता है?


ध्वनियों का उच्चारण, ध्वनियों का एक सुनिश्चित दिशा में विकास, पदरचना में सरलता का आग्रह, अर्थपरिवर्तन के सुनिश्चित कारण आदि अनेक बातें भाषाविज्ञान की वैज्ञानिकता प्रमाणित करती है। संस्कृत व्याकरण की शुद्धता और अपवादहीनता भी भाषाविज्ञान की वैज्ञानिकता की पुष्टि करती है।


विज्ञान की भाँति भाषाविज्ञान भी सिद्धान्त अथवा नियम निर्धारण से सम्बन्ध रखता है। विज्ञान में किसी वस्तु का सम्यक परीक्षण करके उसके सम्बन्ध में नियम निर्धारित किए जाते हैं, उसी प्रकार भाषाविज्ञान में भी भाषा की उत्पत्ति, रचना, विकास इत्यादि सभी तत्वों के विश्लेषण से सामान्य नियम निश्चित कर लिए जाते


भाषाविज्ञान के नियम तत्त्वत: सभी स्थितियों में पूरे उतरते हैं, यद्यपि उनमें अपवाद भी परिलक्षित होते हैं। पर अध्ययन की वैज्ञानिक प्रक्रिया होने के कारण इसे विज्ञान कहना ही अधिक सार्थक होगा, कला नहीं।


भाषा का विकास जनसमाज द्वारा स्वाभाविक रूप से ही होता है, व्यक्ति की इच्छा से उसमें कोई परिवर्तन सम्भव नहीं है। अतः भाषा प्राकृतिक वस्तु है, मानवकृत नहीं। कला सर्वथा मानवीय कृति है। अतः प्राकृतिक भाषा का अध्ययन करने वाला भाषाविज्ञान विज्ञान ही है।


इतना होने पर भी भाषाविज्ञान को प्राकृतिक विज्ञाना (Natural Sciences) के समकक्ष नहीं रखा जा सकता। भाषाविज्ञान अन्य विज्ञानों की अपेक्षा नया विज्ञान है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि


उसकी उपलब्धि अन्य विज्ञानों की अपेक्षा कम व्यवस्थित और कम नियमित हो ।भाषाविज्ञान पूर्ण रूप से विज्ञान ही है। नया और अविकसित होने के कारण यह उस तरह का विज्ञान नहीं होता, जिस तरह के गणित, रसायन, भौतिकशास्त्र आदि। वैसे ज्ञान की अनेक शाखाएँ ऐसी हैं, जिनमें विज्ञान के पूरे लक्षण घटित न होने पर भी उन्हें विज्ञान कहा जाता है। उदा. राजनीतिविज्ञान, समाजविज्ञान, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र आदि । भाषाविज्ञान में कहीं कहीं अपवाद मिलते हैं, अर्थात् भाषा विज्ञान रसायन, भौतिक, गणित की तरह पूर्णरूपेण विशुद्ध अथवा निश्चित विज्ञान (Exact Science) नहीं है। इसलिए वह राजनीतिविज्ञान, समाजविज्ञान की तरह का विज्ञान है।


आजकल अध्ययन के विषयों को तीन वर्गों में रखते हैं -


1) प्राकृतिक विज्ञान (Natural scienceh) उदा. भौतिकी, रसायनशास्त्र आदि।


2) सामाजिक विज्ञान (Social science) उदा. समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि ।


3) मानविकी (Humanities) उदा. साहित्य, संगीतशास्त्र, चित्रकला आदि। भाषाविज्ञान इनमें सामाजिक विज्ञान के निकट आता है। वैसे तो उसकी 'ध्वनि विज्ञान शाखा, विशेषतः ध्वनि के उच्चरित होने के बाद कान तक के संचरण का अध्ययन, प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में आती है, तो उसकी शैली विज्ञान शाखा एक सीमा तक मानविकी में।


कला की दृष्टि से देखें तो भाषाविज्ञान में उपयोगिता, मनोरंजकता और व्यवहार ज्ञान है। किन्तु यह सब गौण रूप में आते हैं। भाषाविज्ञान भाषा से सम्बन्धित सभी समस्याओं का समाधान करता है। भाषाविज्ञान में कार्यकारण भाव, प्रयोग, निरीक्षण, परीक्षण आदि वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को अपनाया जाता है और उनके आधार पर नियमों का निर्धारण होता है। कला के विकल्प, व्यक्तिनिष्ठता, देश-काल से सीमित होना ये बातें भाषाविज्ञान पर लागू नहीं होती हैं, अतएव उसको 'विज्ञान' कहना ही समुचित है।

Wednesday, 2 June 2021

भाषाविज्ञान के अध्ययन का महत्त्व

 (Dr. Eknath Patil)

T. Y. B. A. , HINDI  ,Paper No - 16  , Semester -  06   भाषाविज्ञान के अध्ययन का महत्त्व


भाषाविज्ञान के   के अध्ययन से ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ मानव मात्र के ऐक्य की भावना उभर हर एक के हृदय में अपनी भाषा के प्रति सम्मान, प्रेम और गौरव की भावना होती है। कभी-कभी इसी


जाती है।


कारण अन्य या दूसरों की भाषाओं को व्यक्ति हेय समझता है। भाषाविज्ञान के अध्ययन से हमें ज्ञात होता है कि


कोई भी भाषा श्रेष्ठ या हेय नहीं है। भाषा की उत्पत्ति तथा भाषा के विभिन्न परिवारों के अध्ययन से विश्वबन्धुत्व


की भावना वृद्धिंगत होती है । भाषाविज्ञान का सच्चा अध्ययनकर्ता जाति, धर्म, संप्रदाय आदि पूर्व ग्रहों से मुक्त हो जाता है । और उसमें सभी भाषाओं के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना निर्माण हो जाती है। इससे व्यापक और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण के निर्माण में सहायता मिलती है। भाषा मनुष्य की उच्चतम उपलब्धि है। मनुष्य ने किसी भी दिशा में जो कुछ किया है, उसका मूल श्रेय भाषा को ही है। यदि भाषा न होती तो न तो हमारा चिन्तन सम्भव था, न उसका आदान-प्रदान। फिर हम शायद आज भी वहीं होते जहाँ पशु-पक्षी हैं। ऐसी भाषा की उपलब्धि के बारे में मनुष्य में जिज्ञासा का होना स्वाभाविक


2) ज्ञान पिपासा की तृप्ति


है। भाषाविज्ञान भाषा की उत्पत्ति, विकास, भाषा विशेष के उद्भव एवं विकास तथा प्रयोग आदि के बारे में


हमारी जिज्ञासा को शांत करता है।


भाषाविज्ञान के अध्ययन से निष्काम ज्ञानोपासना की प्रवृत्ति जागती है और भाषा के विषय में जिज्ञासा की तृप्ति हो जाती है। भाषा क्या है ? मानव की भाषा पशु-पक्षियों की बोली से किस तरह भिन्न है? भाषा की उत्पत्ति किस प्रकार हुई? हर आठ कोस पर भाषा क्यों बदल जाती है ? ध्वनियों का उच्चारण किस प्रकार होता है? क, ख, ग, घ एक ही उच्चारण स्थान से बोले जाने पर भी परस्पर भिन्न क्यों हैं? शब्द और अर्थ का क्या सम्बन्ध है ? अंग्रेज 'तुम' का उच्चारण ‘टुम' क्यों करता है? एक ही वाक्य को पंजाबी, बंगाली और तमिल भाषी लोग भिन्न-भिन्न लहजे में क्यों बोलते हैं? इस प्रकार के सैकड़ों प्रश्नों का उत्तर देकर भाषाविज्ञान हमारी जिज्ञासावृत्ति को सन्तुष्ट करता है।


3)


समाज और संस्कृति का ज्ञान


भाषाविज्ञान के द्वारा हम मानव जाति के अतीत तक पहुँच जाते हैं। समाज के विकास का प्रभाव भाषा के विकास पर भी पड़ता है। अत: भाषा के माध्यम से सामाजिक विकास की प्रक्रिया, समाज की भौतिक सभ्यता और मानसिक विकास का पता चलता वेदों की भाषा आज की भाषा से कैसे भिन्न थी? उस भिन्नता से उस युग के जीवन पर क्या प्रकाश पड़ता है? ये बातें भाषाविज्ञान की सहायता से ही जानी जा सकती हैं। यद्यपि यह कार्य इतिहास का है, किन्तु इतिहास प्रमाण न मिलने के कारण अध्ययन नहीं करता। आर्यों का मूल निवास क्या था? इसका उत्तर इतिहास के पास नहीं है, किन्तु प्राचीनतम् साहित्य की भाषा के आधार पर भाषाविज्ञान इस तथ्य की खोज कर चुका है । भाषाविज्ञान से प्राचीन जातियों की मानसिक अवस्था भी समझती है, जो इतिहास से संभव नहींडॉ. श्यामसुन्दरदास लिखते हैं कि वह (भाषाविज्ञान) उस समय का इतिहास लिखने में सहायक होता है, जिस समय का इतिहास स्वयं इतिहास को भी ज्ञात नहीं है।"


•भाषावैज्ञानिक अध्ययन समकालीन समाज के रीति-रिवाजों को समझने में भी सहायक होता है। वेदों में यज्ञ से सम्बन्धित ऋत्विक, यजमान, समिधा, सामग्री, स्त्रुवा, आचमन, यूप, अर्ध्व, पाद्य आदि सैकड़ों शब्दों का प्रयोग आर्यों की यज्ञ संस्कृति का परिचय देता है। मध्ययुग के युद्ध वाद्यों के नाम, भारतीय वस्त्रों, आभूषणों और खाद्य पदार्थों के नाम, कृषि उपकरण सब समकालीन जीवन-शैली का संकेत देते हैं। साथ ही भाषाविज्ञान के अध्ययन से प्राचीन तथा प्रागैतिहासिक संस्कृति पर प्रकाश पड़ता है। भाषाविज्ञान के अध्ययन से इस रहस्य का पता चलता है कि मानवी संस्कृति भाषा-संपृक्त है।


4)


भाषा का सम्यक ज्ञान एवं भाषा विषयक समस्याओं का हल -


हम उठते-बैठते, चलते-फिरते भाषा का उपयोग करते हैं। जितना काम हम भाषा से लेते हैं, उतना


काम शरीर के किसी भी अवयव से नहीं लेते। मनुष्य की जिज्ञासा होती है कि वह जिन वस्तुओं से काम लेता है, उनके विषय में जानना चाहता है। भाषा सीखकर ही हम किसी भी विषय का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। अतः भाषा शिक्षण आज के विश्व की अन्यतम् आवश्यकता है। लोग शरीर की चिन्ता चिकित्सक पर छोड़ देते हैं और भाषा की चिन्ता वैयाकरण पर पर जिस वस्तु से हम दिन-रात काम लेते हैं, उसकी थोड़ी-बहुत जानकारी हर एक भाषा शिक्षण, चाहे वह मातृभाषा का हो या अन्य भाषा का उसके लिए भाषाविज्ञान लाभकारी होता है। भाषाविज्ञान हमें भाषा का सर्वांगीण ज्ञान देता है। इससे भाषा के तत्त्वों का ज्ञान होता है, भाषा की शुद्धता, समुचित प्रयोग ध्यान में आते हैं। शुद्ध आचरण, विभिन्न स्तरों की पाठ्यपुस्तकें तैयार करना, वैज्ञानिक ढंग से को होनी चाहिए।


कम समय में किसी भाषा को ठीक तरह से समझना, शब्दकोशों, उच्चारण चार्टों, विदेशी भाषा शिक्षण के लिए


रेकार्डो, टेपों का जो प्रयोग हो रहा है, वह भाषाविज्ञान की ही देन है। भाषाविज्ञान भाषाविषयक प्रश्नों का समाधान करता है। भाषा क्या है ? उसके अंग क्या है? ध्वनियों का उच्चारण कैसे होता है ? ध्वनियों में भेद क्यों होता है? ख से र का उच्चारण क्यों भिन्न है? एक भाषा की ध्वनियाँ दूसरी भाषा से भिन्न क्यों होती हैं? ध्वनि और अर्थ परिवर्तन क्यों होता है? उदा. एक ही मूल से उत्पन्न 'भक्ति भजन और भाग' विभिन्न अर्थों के वाचक कैसे बने? किसी शब्द का अर्थ क्यों बदल जाता है? 'हरि' शब्द के विष्णु, सूर्य, सिंह, घोड़ा, बन्दर, मेंढक आदि अर्थ क्यों हो गए? 'लड़की आता है। यह ग्राहा क्यों नहीं ? 'लड़की आती है। यह क्यों ग्राह्य होता है? 'न' का अर्थ निषेध सभी जानते हैं, पर मैंने कहा था न ?" वाक्य का 'न' निषेध के बदले विधि वाचक हो गया। उसका अर्थ क्यों बदल गया? स्थान भेद से एक भाषा के अनेक रूप क्या हो जाते हैं? उदा. जाता हूँ। जात ही जात हई। हम प्रत्येक भाषा को क्यों नहीं समझते? दो भाषा में कोई अन्तर होता है या नहीं? है तो क्या? संसार की भाषाओं की उत्पत्ति एक सात से हुई या अनेक स्रोतों से इन भाषाविषयक सभी प्रश्नो का समाधान भाषाविज्ञान ही कर सकता है।प्राचीन साहित्य के अर्थ, उच्चारण एवं प्रयोगादि से सम्बन्धित समस्याओं का समाधन भाषाविज्ञान से हो सकता है। प्राचीन काल में मुद्रण के अभाव में साहित्य प्रमाणित रूप में नहीं मिलता। हस्तलिखित प्रतियों में समानता नहीं होती थी। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक साहित्य केवल कण्ठस्थ या मौखिक रूप से संक्रमित होता था। तब पाठ भेद, अर्थ भेद, उच्चारण भेद तथा शब्दों के सही प्रयोग के संबंध में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती थी। इन समस्याओं को सुलझाने तथा प्राचीन भाषाओं की कृतियों का अर्थ समझने में भाषाविज्ञान सहायक होता है। मैक्समूलर, रोथ आदि विद्वानों ने वेदों का अनुवाद करने में भाषाविज्ञान का ही सहारा लिया था। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'संदेश रासक' इस अपभ्रंश रचना का अनुवाद भाषावैज्ञानिक अध्ययन के सहारे ही किया है । 5) किसी जाति या संपूर्ण मानवता के मानसिक विकास का प्रत्यक्षीकरण


भाषा में मनुष्य के मन की भावनाओं का प्रतिबिंब होता है। मनुष्य जो देखता है, अपने काल में जो अनुभव करता है, उसी की अभिव्यक्ति भाषा में होती है। मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ जैसे- हर्ष, क्रोध, वात्सल्य, भय आदि समान होती हैं। मनुष्य संस्कृति तथा सभ्यता के अध्ययन में भाषाविज्ञान का योगदान मौलिक होता है। ध्वनि एवं शब्दों के अनुशीलन, अनुसंधान से तत्कालीन संस्कृति और सभ्यता पर प्रकाश पड़कर नए-नए तथ्य सामने आते हैं। जैसे आर्य, द्रवीड, मिस्त्र तथा सुमेरियन लोकजीवन और उनकी समाजव्यवस का अंतर्बाह्य ज्ञान भाषाविज्ञान के द्वारा ही उपलब्ध हुआ है। संपूर्ण मानवता के मानसिक विकास के आलेख का प्रत्यक्षीकरण भाषाविज्ञान द्वारा संभव होता है। 6)


अन्य ज्ञान-विज्ञानों का सहायक -


भाषाविज्ञान कई विज्ञानों और शास्त्रों से अन्योन्याश्रित है। विशेष रूप से व्याकरण का तो एक प्रकार से पथ-प्रदर्शक ही है। इतिहास, भूगोल, पुरातत्त्व, मनोविज्ञान, समाजविज्ञान, मानवशास्त्र, सूचना प्राद्योगिकी, राजनीति आदि भाषाविज्ञान से अधिक मात्रा में सहाय्य पाते हैं।


इतिहास की तिथियाँ निश्चित करने के लिए भाषाविज्ञान की एक शाखा ऐतिहासिक भाषाविज्ञान उ समय की भाषायी स्थिति से काम लेती है। उस समय की भाषा से आज की भाषा कितनी परिवर्तित हो गई और उसे इस परिवर्तन के लिए कितना समय लगा होगा। इसका अध्ययन इसके अंतर्गत किया जाता है।


स्थानीय भौगोलिक परिस्थिति का भाषा पर बहुत प्रभाव पड़ता है। किसी स्थान में बोली जाने वाली भाषा में वहाँ के पेड़-पौधे, जानवर, पक्षी, अन्न आदि के लिए शब्द मिलते हैं। आर्यों का मूल स्थान निश्चित करने


के लिए भौगोलिक उपादानों का आधार लिया था। भूगोल-वेत्ता भाषाविज्ञान की जानकारी से किसी क्षेत्र की स्थिति उदा. मैदानी, पहाड़ी आदि के सम्बन्ध में निष्कर्ष निकाल सकता है।


मिलता है। मनुष्य के भावों और विचारों की वाहिका भाषा तथा भाषाविज्ञान है। पागलों की मनोवैज्ञानिक शिलालेखों, ताम्रपत्रों, पांडुलिपियों का अर्थ समझने के लिए भाषाविज्ञान का योगदान मौलिक रूप में चिकित्सा में, पागल द्वारा कहीं जाने वाली असंबद्ध बातों के अध्ययन विश्लेषण में भाषाविज्ञान से पर्याप्त सहायता मिलती है। भाषाविज्ञान और मनोविज्ञान की परस्पर उपयोगिता के कारण भाषाविज्ञान की नई शाखा 'मनोभाषाविज्ञान' अस्तित्व में आ गई है।भाषाविज्ञान का सबसे बड़ा योगदान समाज विज्ञान को है। भाषाविज्ञान सामाजिक स्थिति, सभ्यता, रीति-रिवाजों आदि पर प्रकाश डालता है। उदा. पतिविहीन स्त्री के लिए 'विधवा' शब्द है । यह स्त्री के जीवन में पति का महत्व और उसे पुनर्विवाह करने का अधिकार न होने का सूचक है। राजनीति में प्रान्तीय भाषा निश्चित करने, राज्य भाषा नीति अपनाने सीमावर्ती क्षेत्रों की भाषा निश्चित करने के लिए भाषावैज्ञानिकों की काफी सहायता हो सकती है। आज के सूचना प्रौद्योगिकी युग में भाषाविज्ञान का एक विस्तृत आयाम ही खुल गया है।


उपर्युक्त ज्ञान-विज्ञानों की सहायता से भाषा विज्ञान भी अपने अध्ययन बना देता है। इस प्रकार भाषाविज्ञान ज्ञान की वृद्धि का माध्यम है।


7)


अन्य विज्ञानों का जनक


को वैज्ञानिक तथा तर्कसम्मत


भाषाविज्ञान के स्वरूप से ही अध्ययन की दो और शाखाएं मत विज्ञान और जनकथा-विज्ञान का जन्म हुआ है। (1) मत विज्ञान विश्व के विभिन्न मतों, धर्मों की तुलना का विज्ञान (2) जन-कथा विज्ञान


लोक,


8)


प्रचलित कथा, दंत कथाओं का अध्ययन | विश्व के लिए एक कृत्रिम भाषा


का विकास करने में सहायक


भाषाविज्ञान पूरे विश्व के वैचारिक आदान-प्रदान के लिए एक ही भाषा का सृजन करने का प्रयास कर रहा है। एस्पेरैता कृत्रिम भाषा इसी प्रयास का फल है। इस भाषा के जनक जमेनहाफ हैं। करीब 50,000 से अधिक पुस्तकें इस भाषा में प्रकाशित हुई हैं। यूरोप के अनेक विश्वविद्यालयों में इसके अध्ययन का प्रबन्ध है। इस भाषा में यूरोप के बाईस रेडियो स्टेशनों पर समाचार प्रसारित होते हैं।


अनुवाद में सहायक


अनुवाद प्रायोगिक भाषाविज्ञान के अन्तर्गत आता है, इसमें भाषाविज्ञान काफी मद्द करता है। अनुवाद


केवल एक भाषा के शब्द के लिए दूसरी भाषा का शब्द रखना नहीं है, तो एक भाषा की वैचारिक निधि को दूसरी भाषा में यथावत् या भावानुबाद रूप से व्यक्त करने का प्रयास है। अनुवाद का कार्य समुचित ढंग से होने के लिए भाषाविज्ञान सहायक होता है । जिस रचना का अनुवाद करना है, उसकी सूक्ष्म विशेषताओं का स्पष्ट ज्ञान भाषाविज्ञान से होने के कारण अनुवाद उच्च कोटि का तथा सटीक होता है। किसी भाषा के लिए लिपि निर्धारण या नई लिपि का निर्माण भाषाविज्ञान की सहायता के बिना असंभव है । आशु-लिपि तो पूर्णतः भाषाविज्ञान की देन है। लिपि शिक्षण में भी भाषाविज्ञान में दिए गए लिपि विश्लेषण


10) लिपि निर्माण तथा सुधार में सहायता -


से सहायता मिलती है। भाषाविज्ञान के अंतर्गत लिपि का एककालिक, तुलनात्मक, पूर्वकालिक, कालक्रमिक अध्ययन किया जाता है। लिपि में सरलता एवं शुद्धता की दृष्टि से परिवर्तन तथा सुधार करने में भाषाविज्ञान से सहयोग मिलता है। 'ब्रेल-लिपि' का अध्ययन विश्लेषण भी भाषाविज्ञान के अंतर्गत ही आता है ।


वाक्-चिकित्सा के लिए आवश्यक -


कुछ लोग तथा बालकों में तुतलाहट, हकलाहट, अशुद्ध उच्चारण,श्रवनदोष होते हैं। परिणामतः उन्हेंअपने भाव व्यक्त करने में बाधा पड़ती है। ऐसे लोगों के तुतलाहट या हकलाहट के कारण ढूँढने में भाषाविज्ञान सहायता पहुंचाता है। इन दोषों का संबंध स्वरयंत्र, स्वर-तंत्री, नासिका विवर, तालु, दाँत, जीभ, होंठ, कंठ आदि से होता है। और इन सब का 'ध्वनि' के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है।


ध्वनियों के उच्चारण में क्या भूल हो रही है? उसे कैसे दूर किया जा सकता है ? आदि उच्चारण विषयक दोषों को भाषाविज्ञान के सहारे ही सुलझा सकते हैं । निदान, उपचार तथा चिकित्सा में भाषावैज्ञानिक अध्ययन का लाभ होता है।


12) संचार के साधनों को उन्नत (विकसित) बनाने में सहायक


संचार के साधनों को समुन्नत बनाने में भाषाविज्ञान की सहायता लेनी पड़ती है। उदा.दूर संचार या यान्त्रिक अनुवाद के लिए संकेतों का निर्माण या तत्संबंधी सिद्धान्तों का प्रणयन तभी संभव है, जब भाषिक संकेतों से परिचय हो और भाषिक संकेतों का पूर्ण परिचय भाषाविज्ञान के बिना अकल्पनीय है। टाइपरायटर, शार्टहैण्ड आदि के निर्माण और समुन्नत बनाने के लिए भी भाषाविज्ञान मद्द करता है। भाषाविज्ञान की प्रयोगशाला में बैठकर, टेप द्वारा दुनिया की किसी भी भाषा को सीखा जा सकता है। टेलिफोन द्वारा संवाद भेजने की गति तीव्र करने में प्रयोगात्मक स्रोत ध्वनि-विज्ञान सहायता पहुँचता है।


ध्वनि से संबंध रखने वाले सभी यंत्रों के निर्माण में ध्वनि-विज्ञान का आधार उपयुक्त है। ग्रामोफोन, रेडियो, टेलिफोन, टेलीकम्यूनिकेशन, संगणक आदि का विकास ध्वनि-विज्ञान की सहायता से हो सकता है।


टाईपरायटर में की बोर्ड निर्धारण, उसमें परिवर्तन, प्रेस में टाईप की व्यवस्था आदि में भाषाविज्ञान उपादेय सिद्ध हुआ है। 'फैक्स' का संबंध लिपि विज्ञान से है। ये सारे यंत्र शीघ्र विकास कर रहे हैं और मानव के लिए वरदान साबीत हो रहे हैं।


13) परिभाषिक शब्दावली के निर्माण और भाषा के मानकीकरण में उपयोग पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण में भाषाविज्ञान काफी सहायक होता है। संस्कृत के शब्दों और धातुओं में प्रत्यय जोड़कर सैकड़ों पारिभाषिक शब्द गढ़े गए हैं और आवश्यकता पड़ने पर और हजारो शब्द बनाए जा सकते हैं। अंग्रेजी की शब्दावली ग्रीक और लैटिन भाषाओं के शब्दों से विकसित हुई है। उर्दू में भी अरबी की धातुओं से असंख्य शब्द बनाए गए हैं। भाषा का विकास और अभिव्यंजना में वृद्धि के लिए भाषाविज्ञान का योगदान महत्त्वपूर्ण है। बच्चों तथा


अन्य भाषा-भाषियों के लिए क्रमिक पुस्तकों के निर्माणार्थ भाषाविज्ञान मूलभूत सामग्री देता है। भाषा का परिनिष्ठित


रूप व्याकरण द्वारा नियंत्रित होता है। व्याकरण केवल मानक भाषा को मान्य रूप देकर शांत होता है, तो


भाषाविज्ञान वह रूप क्या है, कहाँ से आया है, कितना प्राचीन है आदि का गहराई में जाकर पता लगाता है। 14) भाषा की शिक्षा, शुद्धता और समुचित प्रयोग में सहायक


सर्वश्रेष्ठ भूमिका निभाता है। विदेशी भाषा की ध्वनियों को आत्मसात करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन मातृभाषा तथा विदेशी भाषाओं के सीखने में पूर्णत:, सरलता और शीघ्रता के लिए भाषाविज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ भूमिका निभाता है . विदेशी भाषा की ध्वनियों  को आत्मसात करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टी से अध्ययन

 करना पड़ता है।भाषा की शुद्धता और समुचित प्रयोग का ज्ञान तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक भाषा के तत्वों का परिचय न हो और वह भाषाविज्ञान से ही संभव है। भारत में अध्ययन का आरंभ ही ध्वनिविज्ञान से होता था, जिसे प्राचीन काल में 'शिक्षा' कहा जाता था। आज विदेशी भाषा शिक्षा के लिए ध्वनिविज्ञान की सहायता अनिवार्य ली जाती हैं। क्योंकि उसके अभाव में ध्वनि का शुद्ध उच्चारण सम्भव नहीं है।


भाषा के ध्वन्यात्मक स्वरूप को ठीक ढंग से समझने तथा वर्णविन्यास को शुद्ध करने में ध्वनिविज्ञान की सहायता मिलती है। संगीत के आरोह अवरोह, मात्रा जानने में ध्वनिविज्ञान का अध्ययन आवश्यक होता है 1


15) गौण उपयोग -


थिएटर, सिनेमा, नाटक, भाषण में वाचाभिनय सहायता भाषाविज्ञान करता है। यान्त्रिक अनुवाद (कम्यूटराइज्ड ट्रांसलेशन) को अधिक सक्षम और निर्दोष बनाया जा सकता है। व्यावसायिक विज्ञापनों के लिए नारे या घोष वाक्य तैयार करने में दक्षता हासिल की जा सकती है। कोश निर्माण, भ्रांतियों का निवारण, रेडियो पर वार्ता प्रसारण, टी. वी. पर बोलने का ढंग आदि में भाषाविज्ञान सहयोग देता है।


संक्षेप में भाषाविज्ञान का अध्ययन हमारे लिए उतना ही उपयोगी है, जितना किसी भी अन्य शास्त्र का । वह भाषा सम्बन्धी समस्याओं का सही समाधान प्रस्तुत करता है। भाषाविज्ञान के लाभ सभी क्षेत्रों में हैं।

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