Wednesday, 2 June 2021

मराठीचा उगम काळ

 *मराठी विभाग* 

 बी.ए.भाग- 3 सत्र-6 पेपर क्रमांक- 13 ( *भाषाविज्ञान आणि मराठी भाषा)* 

प्रा.डॉ.विश्वास पाटील 


*मराठीचा उगम काळ* 

मराठी भाषेचा उगम काळ आपणास निश्चित करावयाचा आहे मराठी भाषेची सुरुवात आपण यादव काळापासून म्हणजे तेराव्या शतकापासून मानतो समाजामध्ये मराठी भाषा व व्यापार स्थिर होत असताना म्हणजेच मराठी ही बोली भाषा किंवा लोक भाषा होताना या भाषेमध्ये या शतकात लिहिले बोलले जात होते त्यामुळे मराठीचा उगम का शोधताना आपणास यादव काळापासून मागे जाऊन विविध ग्रंथ शिलालेख आणि ताम्रपट यांचा मागोवा घ्यावा लागतो.

 सन 1960 मध्ये भाषावार प्रांतरचनेच्या तत्त्वानुसार महाराष्ट्र राज्याची स्थापना झाली महाराष्ट्र हे राज्य प्रामुख्याने मराठी भाषा बोलणाऱ्यांची आहे महाराष्ट्राच्या सीमा गुजरात मध्य प्रदेश आंध्र प्रदेश कर्नाटक आणि गोवा या राज्यांनी मर्यादित झाले आहेत महाराष्ट्राचे कोकण पश्चिम महाराष्ट्र विदर्भ आणि मराठवाडा असे स्थूलमानाने विभाग पडतात. मराठी भाषेचा उगम काढणे शेतीच्या साधनांमध्ये ग्रंथांना खूप महत्त्व आहे ग्रंथात असणारी भाषा त्यातील शब्द रुपये नाम क्रियापद विशेषण ए याचे स्वरूप पडताळून पाहिल्यास तत्कालीन मराठी भाषेची एक निश्चित रूपरेषा आपणास उभी करता येते आपण इथे काही ग्रंथांची माहिती घेऊ.

१) वररुचि- (इसवी सनाचे पाचवे शतक) या प्राकृत व्याकरणकारणे प्राकृत प्रकाश या आपल्या ग्रंथात महाराष्ट्री या प्राकृत भाषेला जणू प्रमुख प्राकृत भाषा म्हणून तिचे वर्णन पहिल्या आठ प्रकरणांमध्ये केले आहे. त्यानंतर शौरसेनी, मागधी व पैशाची या प्राकृत भाषांवर एकेक प्रकरण दिले आहे. ज्यावर ती महाराष्ट्री या प्राक्रुत भाषेवरच आठ प्रकरणे आहेत. तसेच तिचे व्याकरण लिहिले जाते त्यावर ती महाराष्ट्री प्राकृत भाषा लोकांच्या बोलण्यात होती तसेच तिचा प्रसार वाढून ही जिवंत स्वरूपात विकसित होत होती हे लक्षात येते वररुची प्रमाणेच हेमचंद्रा नेही प्राकृत चंद्रिका या ग्रंथ नामाने प्रकृतीचे व्याकरण लिहिले.

२) कुवलयमIला - इ.स.७७८ ज्या कुवलयमला या ग्रंथाचा कर्ता कवी उद्योतनसूरी याने अठरा देशी भाषांचा उल्लेख केला आहे. त्यात मरहट्टे भाषेचा उल्लेख करून त्या देशातील माणसांचे वर्णन पुढीलप्रमाणे केले आहे. दडमडह सामलंगे सहीरे आहीमाने कल हसिले ये गहिले डुलवी रे तत्व मरहट्टे आठव्या शतकाच्या सुमारास दिसणारी गहिले अशी शब्द रूपे मराठी भाषेचे विशिष्ट तत्त्व व्यक्त करतात. सर्वसामान्यांच्या व्यवहाराची ती लोकं भाषा बनली होती याचे ते निदर्शक आहेत.

३) नव्या शतकाच्या सुमारास विठ्ठल कविता वैद्यकचकोरचंद्रिका हा वैद्यक  शास्त्रीय संस्कृत ग्रंथ अधून-मधून मराठी भाषेचा आधार घेताना दिसतो श्रीपती कवीचा ज्योतिष रत्नमाला हा ग्रंथ 1039 मधील आहे. या ग्रंथात श्रीपती कवी तिथी, वार, नक्षत्र, मुहूर्त या विषयाची खगोलशास्त्रीय माहिती मराठी भाषेत देतो.

४) राजमतीप्रबोध - इसवी सनाच्या अकराव्या शतकाच्या उत्तरार्धात यशचंद्र जैन यांनी राजमती प्रबोध  नावाच्या संस्कृत नाटकात राजीमती या नायिकीचे वर्णन मराठी भाषेत केले आहे. या नाटकात केला. त्यांनी महाराष्ट्र म्हणजेच मराठी स्त्री म्हटले आहे.

५) मानसोललास - चालुक्य वंशीय दुसऱ्या विक्रमादित्याचा मुलगा सोमेश्वर याने इस 1129 मध्ये मानसोल्लास अथवा  अभिलासीतार्थचिंतामणनी नावाचा संस्कृत ग्रंथ लिहिला. या ग्रंथात मराठी स्त्रिया जात्यावर दळण दळताना म्हणत असलेल्या ओव्यांचा उल्लेख आहे. यावरून मराठी लोकगीतांची जुनी परंपरा व तत्कालीन मराठी बोलीचे अस्सल रूप येथे पाहायला मिळते.

भाषाविज्ञान के अध्ययन का महत्त्व

 (Dr. Eknath Patil)

T. Y. B. A. , HINDI  ,Paper No - 16  , Semester -  06   भाषाविज्ञान के अध्ययन का महत्त्व


भाषाविज्ञान के   के अध्ययन से ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ मानव मात्र के ऐक्य की भावना उभर हर एक के हृदय में अपनी भाषा के प्रति सम्मान, प्रेम और गौरव की भावना होती है। कभी-कभी इसी


जाती है।


कारण अन्य या दूसरों की भाषाओं को व्यक्ति हेय समझता है। भाषाविज्ञान के अध्ययन से हमें ज्ञात होता है कि


कोई भी भाषा श्रेष्ठ या हेय नहीं है। भाषा की उत्पत्ति तथा भाषा के विभिन्न परिवारों के अध्ययन से विश्वबन्धुत्व


की भावना वृद्धिंगत होती है । भाषाविज्ञान का सच्चा अध्ययनकर्ता जाति, धर्म, संप्रदाय आदि पूर्व ग्रहों से मुक्त हो जाता है । और उसमें सभी भाषाओं के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना निर्माण हो जाती है। इससे व्यापक और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण के निर्माण में सहायता मिलती है। भाषा मनुष्य की उच्चतम उपलब्धि है। मनुष्य ने किसी भी दिशा में जो कुछ किया है, उसका मूल श्रेय भाषा को ही है। यदि भाषा न होती तो न तो हमारा चिन्तन सम्भव था, न उसका आदान-प्रदान। फिर हम शायद आज भी वहीं होते जहाँ पशु-पक्षी हैं। ऐसी भाषा की उपलब्धि के बारे में मनुष्य में जिज्ञासा का होना स्वाभाविक


2) ज्ञान पिपासा की तृप्ति


है। भाषाविज्ञान भाषा की उत्पत्ति, विकास, भाषा विशेष के उद्भव एवं विकास तथा प्रयोग आदि के बारे में


हमारी जिज्ञासा को शांत करता है।


भाषाविज्ञान के अध्ययन से निष्काम ज्ञानोपासना की प्रवृत्ति जागती है और भाषा के विषय में जिज्ञासा की तृप्ति हो जाती है। भाषा क्या है ? मानव की भाषा पशु-पक्षियों की बोली से किस तरह भिन्न है? भाषा की उत्पत्ति किस प्रकार हुई? हर आठ कोस पर भाषा क्यों बदल जाती है ? ध्वनियों का उच्चारण किस प्रकार होता है? क, ख, ग, घ एक ही उच्चारण स्थान से बोले जाने पर भी परस्पर भिन्न क्यों हैं? शब्द और अर्थ का क्या सम्बन्ध है ? अंग्रेज 'तुम' का उच्चारण ‘टुम' क्यों करता है? एक ही वाक्य को पंजाबी, बंगाली और तमिल भाषी लोग भिन्न-भिन्न लहजे में क्यों बोलते हैं? इस प्रकार के सैकड़ों प्रश्नों का उत्तर देकर भाषाविज्ञान हमारी जिज्ञासावृत्ति को सन्तुष्ट करता है।


3)


समाज और संस्कृति का ज्ञान


भाषाविज्ञान के द्वारा हम मानव जाति के अतीत तक पहुँच जाते हैं। समाज के विकास का प्रभाव भाषा के विकास पर भी पड़ता है। अत: भाषा के माध्यम से सामाजिक विकास की प्रक्रिया, समाज की भौतिक सभ्यता और मानसिक विकास का पता चलता वेदों की भाषा आज की भाषा से कैसे भिन्न थी? उस भिन्नता से उस युग के जीवन पर क्या प्रकाश पड़ता है? ये बातें भाषाविज्ञान की सहायता से ही जानी जा सकती हैं। यद्यपि यह कार्य इतिहास का है, किन्तु इतिहास प्रमाण न मिलने के कारण अध्ययन नहीं करता। आर्यों का मूल निवास क्या था? इसका उत्तर इतिहास के पास नहीं है, किन्तु प्राचीनतम् साहित्य की भाषा के आधार पर भाषाविज्ञान इस तथ्य की खोज कर चुका है । भाषाविज्ञान से प्राचीन जातियों की मानसिक अवस्था भी समझती है, जो इतिहास से संभव नहींडॉ. श्यामसुन्दरदास लिखते हैं कि वह (भाषाविज्ञान) उस समय का इतिहास लिखने में सहायक होता है, जिस समय का इतिहास स्वयं इतिहास को भी ज्ञात नहीं है।"


•भाषावैज्ञानिक अध्ययन समकालीन समाज के रीति-रिवाजों को समझने में भी सहायक होता है। वेदों में यज्ञ से सम्बन्धित ऋत्विक, यजमान, समिधा, सामग्री, स्त्रुवा, आचमन, यूप, अर्ध्व, पाद्य आदि सैकड़ों शब्दों का प्रयोग आर्यों की यज्ञ संस्कृति का परिचय देता है। मध्ययुग के युद्ध वाद्यों के नाम, भारतीय वस्त्रों, आभूषणों और खाद्य पदार्थों के नाम, कृषि उपकरण सब समकालीन जीवन-शैली का संकेत देते हैं। साथ ही भाषाविज्ञान के अध्ययन से प्राचीन तथा प्रागैतिहासिक संस्कृति पर प्रकाश पड़ता है। भाषाविज्ञान के अध्ययन से इस रहस्य का पता चलता है कि मानवी संस्कृति भाषा-संपृक्त है।


4)


भाषा का सम्यक ज्ञान एवं भाषा विषयक समस्याओं का हल -


हम उठते-बैठते, चलते-फिरते भाषा का उपयोग करते हैं। जितना काम हम भाषा से लेते हैं, उतना


काम शरीर के किसी भी अवयव से नहीं लेते। मनुष्य की जिज्ञासा होती है कि वह जिन वस्तुओं से काम लेता है, उनके विषय में जानना चाहता है। भाषा सीखकर ही हम किसी भी विषय का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। अतः भाषा शिक्षण आज के विश्व की अन्यतम् आवश्यकता है। लोग शरीर की चिन्ता चिकित्सक पर छोड़ देते हैं और भाषा की चिन्ता वैयाकरण पर पर जिस वस्तु से हम दिन-रात काम लेते हैं, उसकी थोड़ी-बहुत जानकारी हर एक भाषा शिक्षण, चाहे वह मातृभाषा का हो या अन्य भाषा का उसके लिए भाषाविज्ञान लाभकारी होता है। भाषाविज्ञान हमें भाषा का सर्वांगीण ज्ञान देता है। इससे भाषा के तत्त्वों का ज्ञान होता है, भाषा की शुद्धता, समुचित प्रयोग ध्यान में आते हैं। शुद्ध आचरण, विभिन्न स्तरों की पाठ्यपुस्तकें तैयार करना, वैज्ञानिक ढंग से को होनी चाहिए।


कम समय में किसी भाषा को ठीक तरह से समझना, शब्दकोशों, उच्चारण चार्टों, विदेशी भाषा शिक्षण के लिए


रेकार्डो, टेपों का जो प्रयोग हो रहा है, वह भाषाविज्ञान की ही देन है। भाषाविज्ञान भाषाविषयक प्रश्नों का समाधान करता है। भाषा क्या है ? उसके अंग क्या है? ध्वनियों का उच्चारण कैसे होता है ? ध्वनियों में भेद क्यों होता है? ख से र का उच्चारण क्यों भिन्न है? एक भाषा की ध्वनियाँ दूसरी भाषा से भिन्न क्यों होती हैं? ध्वनि और अर्थ परिवर्तन क्यों होता है? उदा. एक ही मूल से उत्पन्न 'भक्ति भजन और भाग' विभिन्न अर्थों के वाचक कैसे बने? किसी शब्द का अर्थ क्यों बदल जाता है? 'हरि' शब्द के विष्णु, सूर्य, सिंह, घोड़ा, बन्दर, मेंढक आदि अर्थ क्यों हो गए? 'लड़की आता है। यह ग्राहा क्यों नहीं ? 'लड़की आती है। यह क्यों ग्राह्य होता है? 'न' का अर्थ निषेध सभी जानते हैं, पर मैंने कहा था न ?" वाक्य का 'न' निषेध के बदले विधि वाचक हो गया। उसका अर्थ क्यों बदल गया? स्थान भेद से एक भाषा के अनेक रूप क्या हो जाते हैं? उदा. जाता हूँ। जात ही जात हई। हम प्रत्येक भाषा को क्यों नहीं समझते? दो भाषा में कोई अन्तर होता है या नहीं? है तो क्या? संसार की भाषाओं की उत्पत्ति एक सात से हुई या अनेक स्रोतों से इन भाषाविषयक सभी प्रश्नो का समाधान भाषाविज्ञान ही कर सकता है।प्राचीन साहित्य के अर्थ, उच्चारण एवं प्रयोगादि से सम्बन्धित समस्याओं का समाधन भाषाविज्ञान से हो सकता है। प्राचीन काल में मुद्रण के अभाव में साहित्य प्रमाणित रूप में नहीं मिलता। हस्तलिखित प्रतियों में समानता नहीं होती थी। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक साहित्य केवल कण्ठस्थ या मौखिक रूप से संक्रमित होता था। तब पाठ भेद, अर्थ भेद, उच्चारण भेद तथा शब्दों के सही प्रयोग के संबंध में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती थी। इन समस्याओं को सुलझाने तथा प्राचीन भाषाओं की कृतियों का अर्थ समझने में भाषाविज्ञान सहायक होता है। मैक्समूलर, रोथ आदि विद्वानों ने वेदों का अनुवाद करने में भाषाविज्ञान का ही सहारा लिया था। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'संदेश रासक' इस अपभ्रंश रचना का अनुवाद भाषावैज्ञानिक अध्ययन के सहारे ही किया है । 5) किसी जाति या संपूर्ण मानवता के मानसिक विकास का प्रत्यक्षीकरण


भाषा में मनुष्य के मन की भावनाओं का प्रतिबिंब होता है। मनुष्य जो देखता है, अपने काल में जो अनुभव करता है, उसी की अभिव्यक्ति भाषा में होती है। मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ जैसे- हर्ष, क्रोध, वात्सल्य, भय आदि समान होती हैं। मनुष्य संस्कृति तथा सभ्यता के अध्ययन में भाषाविज्ञान का योगदान मौलिक होता है। ध्वनि एवं शब्दों के अनुशीलन, अनुसंधान से तत्कालीन संस्कृति और सभ्यता पर प्रकाश पड़कर नए-नए तथ्य सामने आते हैं। जैसे आर्य, द्रवीड, मिस्त्र तथा सुमेरियन लोकजीवन और उनकी समाजव्यवस का अंतर्बाह्य ज्ञान भाषाविज्ञान के द्वारा ही उपलब्ध हुआ है। संपूर्ण मानवता के मानसिक विकास के आलेख का प्रत्यक्षीकरण भाषाविज्ञान द्वारा संभव होता है। 6)


अन्य ज्ञान-विज्ञानों का सहायक -


भाषाविज्ञान कई विज्ञानों और शास्त्रों से अन्योन्याश्रित है। विशेष रूप से व्याकरण का तो एक प्रकार से पथ-प्रदर्शक ही है। इतिहास, भूगोल, पुरातत्त्व, मनोविज्ञान, समाजविज्ञान, मानवशास्त्र, सूचना प्राद्योगिकी, राजनीति आदि भाषाविज्ञान से अधिक मात्रा में सहाय्य पाते हैं।


इतिहास की तिथियाँ निश्चित करने के लिए भाषाविज्ञान की एक शाखा ऐतिहासिक भाषाविज्ञान उ समय की भाषायी स्थिति से काम लेती है। उस समय की भाषा से आज की भाषा कितनी परिवर्तित हो गई और उसे इस परिवर्तन के लिए कितना समय लगा होगा। इसका अध्ययन इसके अंतर्गत किया जाता है।


स्थानीय भौगोलिक परिस्थिति का भाषा पर बहुत प्रभाव पड़ता है। किसी स्थान में बोली जाने वाली भाषा में वहाँ के पेड़-पौधे, जानवर, पक्षी, अन्न आदि के लिए शब्द मिलते हैं। आर्यों का मूल स्थान निश्चित करने


के लिए भौगोलिक उपादानों का आधार लिया था। भूगोल-वेत्ता भाषाविज्ञान की जानकारी से किसी क्षेत्र की स्थिति उदा. मैदानी, पहाड़ी आदि के सम्बन्ध में निष्कर्ष निकाल सकता है।


मिलता है। मनुष्य के भावों और विचारों की वाहिका भाषा तथा भाषाविज्ञान है। पागलों की मनोवैज्ञानिक शिलालेखों, ताम्रपत्रों, पांडुलिपियों का अर्थ समझने के लिए भाषाविज्ञान का योगदान मौलिक रूप में चिकित्सा में, पागल द्वारा कहीं जाने वाली असंबद्ध बातों के अध्ययन विश्लेषण में भाषाविज्ञान से पर्याप्त सहायता मिलती है। भाषाविज्ञान और मनोविज्ञान की परस्पर उपयोगिता के कारण भाषाविज्ञान की नई शाखा 'मनोभाषाविज्ञान' अस्तित्व में आ गई है।भाषाविज्ञान का सबसे बड़ा योगदान समाज विज्ञान को है। भाषाविज्ञान सामाजिक स्थिति, सभ्यता, रीति-रिवाजों आदि पर प्रकाश डालता है। उदा. पतिविहीन स्त्री के लिए 'विधवा' शब्द है । यह स्त्री के जीवन में पति का महत्व और उसे पुनर्विवाह करने का अधिकार न होने का सूचक है। राजनीति में प्रान्तीय भाषा निश्चित करने, राज्य भाषा नीति अपनाने सीमावर्ती क्षेत्रों की भाषा निश्चित करने के लिए भाषावैज्ञानिकों की काफी सहायता हो सकती है। आज के सूचना प्रौद्योगिकी युग में भाषाविज्ञान का एक विस्तृत आयाम ही खुल गया है।


उपर्युक्त ज्ञान-विज्ञानों की सहायता से भाषा विज्ञान भी अपने अध्ययन बना देता है। इस प्रकार भाषाविज्ञान ज्ञान की वृद्धि का माध्यम है।


7)


अन्य विज्ञानों का जनक


को वैज्ञानिक तथा तर्कसम्मत


भाषाविज्ञान के स्वरूप से ही अध्ययन की दो और शाखाएं मत विज्ञान और जनकथा-विज्ञान का जन्म हुआ है। (1) मत विज्ञान विश्व के विभिन्न मतों, धर्मों की तुलना का विज्ञान (2) जन-कथा विज्ञान


लोक,


8)


प्रचलित कथा, दंत कथाओं का अध्ययन | विश्व के लिए एक कृत्रिम भाषा


का विकास करने में सहायक


भाषाविज्ञान पूरे विश्व के वैचारिक आदान-प्रदान के लिए एक ही भाषा का सृजन करने का प्रयास कर रहा है। एस्पेरैता कृत्रिम भाषा इसी प्रयास का फल है। इस भाषा के जनक जमेनहाफ हैं। करीब 50,000 से अधिक पुस्तकें इस भाषा में प्रकाशित हुई हैं। यूरोप के अनेक विश्वविद्यालयों में इसके अध्ययन का प्रबन्ध है। इस भाषा में यूरोप के बाईस रेडियो स्टेशनों पर समाचार प्रसारित होते हैं।


अनुवाद में सहायक


अनुवाद प्रायोगिक भाषाविज्ञान के अन्तर्गत आता है, इसमें भाषाविज्ञान काफी मद्द करता है। अनुवाद


केवल एक भाषा के शब्द के लिए दूसरी भाषा का शब्द रखना नहीं है, तो एक भाषा की वैचारिक निधि को दूसरी भाषा में यथावत् या भावानुबाद रूप से व्यक्त करने का प्रयास है। अनुवाद का कार्य समुचित ढंग से होने के लिए भाषाविज्ञान सहायक होता है । जिस रचना का अनुवाद करना है, उसकी सूक्ष्म विशेषताओं का स्पष्ट ज्ञान भाषाविज्ञान से होने के कारण अनुवाद उच्च कोटि का तथा सटीक होता है। किसी भाषा के लिए लिपि निर्धारण या नई लिपि का निर्माण भाषाविज्ञान की सहायता के बिना असंभव है । आशु-लिपि तो पूर्णतः भाषाविज्ञान की देन है। लिपि शिक्षण में भी भाषाविज्ञान में दिए गए लिपि विश्लेषण


10) लिपि निर्माण तथा सुधार में सहायता -


से सहायता मिलती है। भाषाविज्ञान के अंतर्गत लिपि का एककालिक, तुलनात्मक, पूर्वकालिक, कालक्रमिक अध्ययन किया जाता है। लिपि में सरलता एवं शुद्धता की दृष्टि से परिवर्तन तथा सुधार करने में भाषाविज्ञान से सहयोग मिलता है। 'ब्रेल-लिपि' का अध्ययन विश्लेषण भी भाषाविज्ञान के अंतर्गत ही आता है ।


वाक्-चिकित्सा के लिए आवश्यक -


कुछ लोग तथा बालकों में तुतलाहट, हकलाहट, अशुद्ध उच्चारण,श्रवनदोष होते हैं। परिणामतः उन्हेंअपने भाव व्यक्त करने में बाधा पड़ती है। ऐसे लोगों के तुतलाहट या हकलाहट के कारण ढूँढने में भाषाविज्ञान सहायता पहुंचाता है। इन दोषों का संबंध स्वरयंत्र, स्वर-तंत्री, नासिका विवर, तालु, दाँत, जीभ, होंठ, कंठ आदि से होता है। और इन सब का 'ध्वनि' के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है।


ध्वनियों के उच्चारण में क्या भूल हो रही है? उसे कैसे दूर किया जा सकता है ? आदि उच्चारण विषयक दोषों को भाषाविज्ञान के सहारे ही सुलझा सकते हैं । निदान, उपचार तथा चिकित्सा में भाषावैज्ञानिक अध्ययन का लाभ होता है।


12) संचार के साधनों को उन्नत (विकसित) बनाने में सहायक


संचार के साधनों को समुन्नत बनाने में भाषाविज्ञान की सहायता लेनी पड़ती है। उदा.दूर संचार या यान्त्रिक अनुवाद के लिए संकेतों का निर्माण या तत्संबंधी सिद्धान्तों का प्रणयन तभी संभव है, जब भाषिक संकेतों से परिचय हो और भाषिक संकेतों का पूर्ण परिचय भाषाविज्ञान के बिना अकल्पनीय है। टाइपरायटर, शार्टहैण्ड आदि के निर्माण और समुन्नत बनाने के लिए भी भाषाविज्ञान मद्द करता है। भाषाविज्ञान की प्रयोगशाला में बैठकर, टेप द्वारा दुनिया की किसी भी भाषा को सीखा जा सकता है। टेलिफोन द्वारा संवाद भेजने की गति तीव्र करने में प्रयोगात्मक स्रोत ध्वनि-विज्ञान सहायता पहुँचता है।


ध्वनि से संबंध रखने वाले सभी यंत्रों के निर्माण में ध्वनि-विज्ञान का आधार उपयुक्त है। ग्रामोफोन, रेडियो, टेलिफोन, टेलीकम्यूनिकेशन, संगणक आदि का विकास ध्वनि-विज्ञान की सहायता से हो सकता है।


टाईपरायटर में की बोर्ड निर्धारण, उसमें परिवर्तन, प्रेस में टाईप की व्यवस्था आदि में भाषाविज्ञान उपादेय सिद्ध हुआ है। 'फैक्स' का संबंध लिपि विज्ञान से है। ये सारे यंत्र शीघ्र विकास कर रहे हैं और मानव के लिए वरदान साबीत हो रहे हैं।


13) परिभाषिक शब्दावली के निर्माण और भाषा के मानकीकरण में उपयोग पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण में भाषाविज्ञान काफी सहायक होता है। संस्कृत के शब्दों और धातुओं में प्रत्यय जोड़कर सैकड़ों पारिभाषिक शब्द गढ़े गए हैं और आवश्यकता पड़ने पर और हजारो शब्द बनाए जा सकते हैं। अंग्रेजी की शब्दावली ग्रीक और लैटिन भाषाओं के शब्दों से विकसित हुई है। उर्दू में भी अरबी की धातुओं से असंख्य शब्द बनाए गए हैं। भाषा का विकास और अभिव्यंजना में वृद्धि के लिए भाषाविज्ञान का योगदान महत्त्वपूर्ण है। बच्चों तथा


अन्य भाषा-भाषियों के लिए क्रमिक पुस्तकों के निर्माणार्थ भाषाविज्ञान मूलभूत सामग्री देता है। भाषा का परिनिष्ठित


रूप व्याकरण द्वारा नियंत्रित होता है। व्याकरण केवल मानक भाषा को मान्य रूप देकर शांत होता है, तो


भाषाविज्ञान वह रूप क्या है, कहाँ से आया है, कितना प्राचीन है आदि का गहराई में जाकर पता लगाता है। 14) भाषा की शिक्षा, शुद्धता और समुचित प्रयोग में सहायक


सर्वश्रेष्ठ भूमिका निभाता है। विदेशी भाषा की ध्वनियों को आत्मसात करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन मातृभाषा तथा विदेशी भाषाओं के सीखने में पूर्णत:, सरलता और शीघ्रता के लिए भाषाविज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ भूमिका निभाता है . विदेशी भाषा की ध्वनियों  को आत्मसात करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टी से अध्ययन

 करना पड़ता है।भाषा की शुद्धता और समुचित प्रयोग का ज्ञान तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक भाषा के तत्वों का परिचय न हो और वह भाषाविज्ञान से ही संभव है। भारत में अध्ययन का आरंभ ही ध्वनिविज्ञान से होता था, जिसे प्राचीन काल में 'शिक्षा' कहा जाता था। आज विदेशी भाषा शिक्षा के लिए ध्वनिविज्ञान की सहायता अनिवार्य ली जाती हैं। क्योंकि उसके अभाव में ध्वनि का शुद्ध उच्चारण सम्भव नहीं है।


भाषा के ध्वन्यात्मक स्वरूप को ठीक ढंग से समझने तथा वर्णविन्यास को शुद्ध करने में ध्वनिविज्ञान की सहायता मिलती है। संगीत के आरोह अवरोह, मात्रा जानने में ध्वनिविज्ञान का अध्ययन आवश्यक होता है 1


15) गौण उपयोग -


थिएटर, सिनेमा, नाटक, भाषण में वाचाभिनय सहायता भाषाविज्ञान करता है। यान्त्रिक अनुवाद (कम्यूटराइज्ड ट्रांसलेशन) को अधिक सक्षम और निर्दोष बनाया जा सकता है। व्यावसायिक विज्ञापनों के लिए नारे या घोष वाक्य तैयार करने में दक्षता हासिल की जा सकती है। कोश निर्माण, भ्रांतियों का निवारण, रेडियो पर वार्ता प्रसारण, टी. वी. पर बोलने का ढंग आदि में भाषाविज्ञान सहयोग देता है।


संक्षेप में भाषाविज्ञान का अध्ययन हमारे लिए उतना ही उपयोगी है, जितना किसी भी अन्य शास्त्र का । वह भाषा सम्बन्धी समस्याओं का सही समाधान प्रस्तुत करता है। भाषाविज्ञान के लाभ सभी क्षेत्रों में हैं।

भाषाविज्ञान की परिभाषाएँ

 (Dr Eknath Patil)

T. Y. B. A., HINDI, Paper No  - 16  ,                                 भाषाविज्ञान की परिभाषाएँ

भाषाविज्ञान शब्द


‘भाषाविज्ञान’ शब्द ‘भाषा' और 'विज्ञान' इन दो शब्दों के मेल से बना है। 'भाषा' वह साधन है, जिसके माध्यम से हम सोचते हैं तथा विचारों और भावों को व्यक्त करते हैं। 'विज्ञान' का अर्थ होता है - 'विशिष्ट ज्ञान' । किसी वस्तु की साधारण जानकारी को 'ज्ञान' कहते हैं और उसकी पूरी जानकारी हासिल करना 'विशेष ज्ञान' कहलाता है। विज्ञान मनुष्य की व्यवस्थित और विश्लेषणात्मक पद्धति से सोचने की उपलब्धि है। अतः भाषा के सभी अंगों का व्यवस्थित अध्ययन विश्लेषण करके तत्संबंधी नियमों का प्रतिपादन करना ही भाषा का विशिष्ट अध्ययन या भाषाविज्ञान है।Lingua से हुई है, जिसका अर्थ है- जिह्वा, जबान या जीभ । '‘जबान' शब्द का प्रयोग भाषा के अर्थ में भी होता है। अत: भाषाविज्ञान के लिए Linguistics शब्द का प्रयोग उचित ही है। भाषाविज्ञान शब्द पाश्चात्य विद्वानों की देन है। वर्तमान भाषाविज्ञान का आरंभ 1786 ई. में सर विलियम जोन्स के संस्कृत, लैटिन तथा ग्रीक के तुलनात्मक अध्ययन से माना जाता है।


भाषाविज्ञान को सर्वप्रथम कम्पेरेटिव ग्रामर (Comparative Grammar) नाम दिया गया। उसके पश्चात् कम्पेरेटिव फिलालोजी (Comparative philology) नाम रखा गया। आधुनिक समय में भाषाविज्ञान, भाषाशास्त्र, भाषा विचार, भाषा लोचन, तुलनात्मक भाषाविज्ञान, शब्दशास्त्र, भाषातत्व, भाषिकी आदि शब्द प्रयुक्त हो रहे हैं। प्रयोगाधिक्य की दृष्टि से आज हिंदी में भाषाविज्ञान, भाषाशास्त्र और भाषिकी ये तीन शब्द ही विशेष मान्य एवं उपयुक्त हैं। लेकिन इनमें भी 'भाषाविज्ञान' नाम ही सर्वाधिक मान्य एवं प्रसिद्ध है। केंद्रीय सरकार (शिक्षा मंत्रालय, दिल्ली) के वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के स्थायी आयोग ने मान्य किया हुआ प्रचलित नाम 'भाषाविज्ञान' हर दृष्टि से भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उपयुक्त एवं उपादेय है।


"भाषाविज्ञान : पृष्ठभूमि


भाषाविज्ञान एक अर्वाचीन ज्ञानशाखा है। आधुनिक भाषाविज्ञान का जन्म अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ। इसके जनक सर विलियम जोन्स माने जाते हैं। वे कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रमुख जज थे। उन्होंने रॉयल एशियाटिक सोसायटी के सदस्यों के सामने एक निबंध प्रस्तुत किया, जिसमें संस्कृत, ग्रीक और लैटिन भाषाओं में पाए गए साम्य के आधार पर यह मत व्यक्त किया गया था कि 'भारत और योरोप की भाषाएँ एक ही स्रोत से विकसित हुई है।' इससे भारत और योरोप की भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन का मार्ग प्रशस्त हुआ। यहीं भाषाविज्ञान का प्रारंभ बिंदु था ।


प्राचीन काल में पाश्चात्य देशों में भाषाविज्ञान और व्याकरण के क्षेत्र में उतना गहन अध्ययन नहीं हुआ,


जितना भारत में शिक्षा, निरुक्त और निघण्टु के नाम से ध्वनिविज्ञान, व्युत्पत्तिविज्ञान और कोशविज्ञान का जो सूक्ष्म विश्लेषण वैदिक साहित्य में मिलता है, वह सचमुच अद्भुत है। यूनान डायोनिमस थ्रैक्स ने भाषावैज्ञानिक विषयों का गंभीर विवेचन किया है। में सुकरात, प्लेटा, अरस्तू 19 वीं शताब्दी में भाषावैज्ञानिक अध्ययन में गइराई आई। 20 वीं शताब्दी में तो भाषाविज्ञान के ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन पर केंद्रित भाषाविदों का ध्यान हटकर भाषिक अध्ययन के वर्णनात्मक और एककालिक स्वरूप पर केंद्रित हुआ। 1928 ई. में हेग में अन्तर्राष्ट्रीय भाषाविज्ञान परिषद का प्रथम अधिवेशन हुआ। इसके फलस्वरूप विभिन्न देशों में भाषाविज्ञान के चार केंद्र स्थापित हुए, जिन्हें लन्दन स्कूल, अमेरिकन स्कूल, प्राग स्कूल और कोपनहैगन स्कूल के नाम से जाना जाता है। 20 वीं शताब्दी के भाषावैज्ञानिकों ने भाषा के


अध्ययन को सामाजिक संदर्भों के साथ जोड़कर भाषा को देखने की एक नई दृष्टि प्रदान की है। इस प्रकार


पाणिनी, पतंजलि और थ्रैक्स से लेकर सर विलियम जोन्स, ब्लूम फील्ड, चोम्स्की, किशोरीदास


वाजपेयी और भोलानाथ तिवारी तक सैकडों मनीषियों ने इसे अपने ज्ञान और चिंतन से समृद्ध बनाया है।भाषाविज्ञान की परिभाषाएँ - भाषाविज्ञान को परिभाषा में बांधने की कोशिश अनेक भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों की है। अब हम


क्रमश: उनका अध्ययन करेंगे भारतीय विद्वान : परिभाषाएँ।


प्राचीन भारत में संस्कृत साहित्य के अंतर्गत भाषाविज्ञान और व्याकरण के क्षेत्र में काफी गहराई के


अध्ययन हुआ है । संस्कृत साहित्य म भाषाविज्ञान की दो परिभाषाएँ मिलती हैं.


1) "भाषाया यतु विज्ञान, सर्वागि व्याकृतात्मकम्.


विज्ञानदृष्टिमूलं तद् भाषा विज्ञानभुच्यते ।""


अर्थात् भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भाषा का सर्वागीण विवेचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है।


"भाषाया: विज्ञानम् भाषाविज्ञानम् विशिष्ट ज्ञानम् विज्ञानम् ॥'


अर्थात् भाषा के विशिष्ट ज्ञान को भाषाविज्ञान कहते हैं।

हिंदी के अनेक विद्वानों ने भाषाविज्ञान की परिभाषा बनाने की कोशिश की है। कुछ प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार हैं


डॉ. मंगलदेव शास्त्री "भाषाविज्ञान उस विज्ञान को कहते हैं, जिसमें सामान्य रूप से मानवी भाषा


का, किसी विशेष भाषा की रचना और इतिहास का, भाषाओं या प्रादेशिक भाषाओं के वर्गों की समानताओं


और विषमताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।" डॉ. श्यामसुन्दरदास भाषाविज्ञान उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें भाषा मात्र के भिन्न-भिन्न अंगों और स्वरूपों का विवेचन और निरूपण किया जाता है।


देवेन्द्रनाथ शर्मा - ‘‘भाषाविज्ञान का सीधा अर्थ है- 'भाषा का विज्ञान और विज्ञान का अर्थ है विशिष्ट ज्ञान।" इस प्रकार भाषा का विशिष्ट ज्ञान भाषाविज्ञान है। देवीशंकर द्विवेदी - विवेदी जी भाषाविज्ञान को 'भाषिकी' कहते हैं। उनके अनुसार भाषिकी में भाषा का वैज्ञानिक विवेचन किया जाता है।


डॉ. बाबूराम सक्सेना - "भाषाविज्ञान का अभिप्राय भाषा का विश्लेषण करके उसका दिग्दर्शन करना है। " राजेन्द्र द्विवेदी “ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन के सहारे भाषा के जन्म, गठन, विकास, स्वरूप, अंग, परिवार आदि का विवेचन करने वाले शास्त्र को भाषा विज्ञान कहते हैं. अंबाप्रसाद सुमन "भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भाषाओं का सामान्य रूप से या किसी एक भाषा का विशिष्ट रूप से प्रकृति, संरचना, इतिहास, तुलना, प्रयोग आदि की दृष्टि से सिद्धांत निश्चित करते हुए वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है।"


डॉ. नगेन्द्र - "भाषा या भाषाओं के सर्वपक्षीय एवं सांगोपांग विवेचन का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने वाला विज्ञान भाषाविज्ञान है।" डॉ. उदयनारायण तिवारी - “भाषा शास्त्र का विषय भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करना


हैं। इस अध्ययन की सीमा के अन्तर्गत मानव बट से निःसृत वाणी, प्राचीन तथा अर्वाचीन, संस्कृत एवं असंस्कृत विद्वान एवं निरक्षर सभी के भाषा के रूपों का समावेश करती है।" डॉ. कपिलदेव द्विवेदी “भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भाषा का सर्वांगीण विवेचनात्मक


अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। "


आचार्य किशोरीदास वाजपेयी "भाषा सम्बन्धी विशेष ज्ञान युक्ति युक्त ढंग से प्राप्त करना 'भाषाविज्ञान है।"


आचार्य सीताराम चतुर्वेदी - "भाषा के वैज्ञानिक तत्त्व को जानने की विद्या भाषाविज्ञान है।"


डॉ. मनमोहन गौतम "भाषा विज्ञान वह शास्त्र है, जिसमें ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा भाषा की उत्पत्ति, बनावट, प्रकृति, विकास तथा न्हास आदि की वैज्ञानिक व्याख्या की जाती


17) डॉ. सरयू प्रसाद अग्रवाल - "भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जो संसार की प्रत्येक भाषा पर लागू होने वाले सिद्धान्तों का निर्धारण करता है।"


पाश्चात्य विद्वान : परिभाषाएँ


1) व्हीटनी (Whitney) ‘भाषा अपनी संपूर्णता में भाषाविज्ञान के अध्ययन का विषय है । इसमें मानवीय


वाणी के सभी संभव रूप आ जाते हैं, चाहे वह मनुष्य के मस्तिष्क या मुख में जीवित हो या दस्तावेजों में सुरक्षित अथवा ताम्रलेखों या शिलालेखों में सुरक्षित हो।'


2) प्रो. रॉबिन्स 'सभी देश कालों की मानव-भाषा के समग्र रूपों एवं प्रयोगों का वैज्ञानिक अध्ययन भाषाविज्ञान कहलाता है।'


3)


ब्लूम फील्ड 'भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जो भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन, सामान्य एवं विशेष रूप से करता है।" (Linguistic is a science which concerns with the scientific study of


language in general as well as in particular.) ब्लूम फील्ड यह भी विचार हैं कि जिसमें लिखित भाषा का अध्ययन किया जाता है, उसे Philology कहते हैं, और जिसमें बोलचाल की भाषा का अध्ययन किया जाता है उसे Linguistic कहते हैं।कार्ल वासलर इन्होंने शब्द और अर्थ तत्त्व पर बल देते हुए भाषाविज्ञान की यह परिभाषा की है. 'Linguistics means profound philosophy of language in general as well as in particular.' आस्कर लुइस चावरिया"The general term linguistics includes in addition to


descriptive linguistics historical and comparative study of language. अर्थात "भाषाविज्ञान में वर्णनात्मक भाषाविज्ञान के अतिरिक्त भाषा के ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक अध्ययन का समावेश होता है।"


हॉकेट - "भाषा के बारे में उपलब्ध व्यवस्थित ज्ञान को भाषाविज्ञान कहते हैं।”


मारियो पेई - ‘‘वह शास्त्र जिसमें भाषा, शब्दों एवं भाषायी नियमों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता


है, भाषाविज्ञान कहलाता है।" Dictionary of Linguistics - ‘भाषाविज्ञान भाषा का विज्ञान है।' (Lingustics : The Science


) of Language)


उपर्युक्त परिभाषाओं का अनुशीलन करने से स्पष्ट होता है।


भाषाविज्ञान की व्याप्ति, संरचना, अध्ययन की दिशा आदि में मतभिन्नता होने के कारण परिभाषाओं में


अंतर दिखाई देता है।


कई परिभाषाएँ भाषा के अध्ययन-विश्लेषण आदि भाषाविषयक सामान्य बातों तक ही सीमित रही हैं।


1)

2) कई परिभाषाओं का दृष्टिकोण वर्णनात्मक होकर उन्होंने भाषा के ऐतिहासिक, तुलनात्मक और सैद्धांतिक


बातों को महत्त्व दिया है। सारांश यह कि भाषाविज्ञान


वह विज्ञान है, जिसमें भाषा विषयक जाता है। भाषाविज्ञान की परिभाषा के बारे में हम कह सकते हैं कि भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जो का वैज्ञानिक रीति से सम्यक अध्ययन करता है।

‘भाषाविज्ञान’ शब्द ‘भाषा' और 'विज्ञान' इन दो शब्दों के मेल से बना है। 'भाषा' वह साधन है, जिसके माध्यम से हम सोचते हैं तथा विचारों और भावों को व्यक्त करते हैं। 'विज्ञान' का अर्थ होता है - 'विशिष्ट ज्ञान' । किसी वस्तु की साधारण जानकारी को 'ज्ञान' कहते हैं और उसकी पूरी जानकारी हासिल करना 'विशेष ज्ञान' कहलाता है। विज्ञान मनुष्य की व्यवस्थित और विश्लेषणात्मक पद्धति से सोचने की उपलब्धि है। अतः भाषा के सभी अंगों का व्यवस्थित अध्ययन विश्लेषण करके तत्संबंधी नियमों का प्रतिपादन करना ही भाषा का विशिष्ट अध्ययन या भाषाविज्ञान है।Lingua से हुई है, जिसका अर्थ है- जिह्वा, जबान या जीभ । '‘जबान' शब्द का प्रयोग भाषा के अर्थ में भी होता है। अत: भाषाविज्ञान के लिए Linguistics शब्द का प्रयोग उचित ही है। भाषाविज्ञान शब्द पाश्चात्य विद्वानों की देन है। वर्तमान भाषाविज्ञान का आरंभ 1786 ई. में सर विलियम जोन्स के संस्कृत, लैटिन तथा ग्रीक के तुलनात्मक अध्ययन से माना जाता है।


भाषाविज्ञान को सर्वप्रथम कम्पेरेटिव ग्रामर (Comparative Grammar) नाम दिया गया। उसके पश्चात् कम्पेरेटिव फिलालोजी (Comparative philology) नाम रखा गया। आधुनिक समय में भाषाविज्ञान, भाषाशास्त्र, भाषा विचार, भाषा लोचन, तुलनात्मक भाषाविज्ञान, शब्दशास्त्र, भाषातत्व, भाषिकी आदि शब्द प्रयुक्त हो रहे हैं। प्रयोगाधिक्य की दृष्टि से आज हिंदी में भाषाविज्ञान, भाषाशास्त्र और भाषिकी ये तीन शब्द ही विशेष मान्य एवं उपयुक्त हैं। लेकिन इनमें भी 'भाषाविज्ञान' नाम ही सर्वाधिक मान्य एवं प्रसिद्ध है। केंद्रीय सरकार (शिक्षा मंत्रालय, दिल्ली) के वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के स्थायी आयोग ने मान्य किया हुआ प्रचलित नाम 'भाषाविज्ञान' हर दृष्टि से भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उपयुक्त एवं उपादेय है।


"भाषाविज्ञान : पृष्ठभूमि


भाषाविज्ञान एक अर्वाचीन ज्ञानशाखा है। आधुनिक भाषाविज्ञान का जन्म अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ। इसके जनक सर विलियम जोन्स माने जाते हैं। वे कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रमुख जज थे। उन्होंने रॉयल एशियाटिक सोसायटी के सदस्यों के सामने एक निबंध प्रस्तुत किया, जिसमें संस्कृत, ग्रीक और लैटिन भाषाओं में पाए गए साम्य के आधार पर यह मत व्यक्त किया गया था कि 'भारत और योरोप की भाषाएँ एक ही स्रोत से विकसित हुई है।' इससे भारत और योरोप की भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन का मार्ग प्रशस्त हुआ। यहीं भाषाविज्ञान का प्रारंभ बिंदु था ।


प्राचीन काल में पाश्चात्य देशों में भाषाविज्ञान और व्याकरण के क्षेत्र में उतना गहन अध्ययन नहीं हुआ,


जितना भारत में शिक्षा, निरुक्त और निघण्टु के नाम से ध्वनिविज्ञान, व्युत्पत्तिविज्ञान और कोशविज्ञान का जो सूक्ष्म विश्लेषण वैदिक साहित्य में मिलता है, वह सचमुच अद्भुत है। यूनान डायोनिमस थ्रैक्स ने भाषावैज्ञानिक विषयों का गंभीर विवेचन किया है। में सुकरात, प्लेटा, अरस्तू 19 वीं शताब्दी में भाषावैज्ञानिक अध्ययन में गइराई आई। 20 वीं शताब्दी में तो भाषाविज्ञान के ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन पर केंद्रित भाषाविदों का ध्यान हटकर भाषिक अध्ययन के वर्णनात्मक और एककालिक स्वरूप पर केंद्रित हुआ। 1928 ई. में हेग में अन्तर्राष्ट्रीय भाषाविज्ञान परिषद का प्रथम अधिवेशन हुआ। इसके फलस्वरूप विभिन्न देशों में भाषाविज्ञान के चार केंद्र स्थापित हुए, जिन्हें लन्दन स्कूल, अमेरिकन स्कूल, प्राग स्कूल और कोपनहैगन स्कूल के नाम से जाना जाता है। 20 वीं शताब्दी के भाषावैज्ञानिकों ने भाषा के


अध्ययन को सामाजिक संदर्भों के साथ जोड़कर भाषा को देखने की एक नई दृष्टि प्रदान की है। इस प्रकार


पाणिनी, पतंजलि और थ्रैक्स से लेकर सर विलियम जोन्स, ब्लूम फील्ड, चोम्स्की, किशोरीदास


वाजपेयी और भोलानाथ तिवारी तक सैकडों मनीषियों ने इसे अपने ज्ञान और चिंतन से समृद्ध बनाया है।भाषाविज्ञान की परिभाषाएँ - भाषाविज्ञान को परिभाषा में बांधने की कोशिश अनेक भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों की है। अब हम


क्रमश: उनका अध्ययन करेंगे भारतीय विद्वान : परिभाषाएँ।


प्राचीन भारत में संस्कृत साहित्य के अंतर्गत भाषाविज्ञान और व्याकरण के क्षेत्र में काफी गहराई के


अध्ययन हुआ है । संस्कृत साहित्य म भाषाविज्ञान की दो परिभाषाएँ मिलती हैं.


1)


"भाषाया यतु विज्ञान, सर्वागि व्याकृतात्मकम्.


विज्ञानदृष्टिमूलं तद् भाषा विज्ञानभुच्यते ।""


अर्थात् भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भाषा का सर्वागीण विवेचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। "भाषाया: विज्ञानम् भाषाविज्ञानम् विशिष्ट ज्ञानम् विज्ञानम् ॥'


अर्थात् भाषा के विशिष्ट ज्ञान को भाषाविज्ञान कहते हैं।


हिंदी के अनेक विद्वानों ने भाषाविज्ञान की परिभाषा बनाने की कोशिश की है। कुछ प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार हैं


डॉ. मंगलदेव शास्त्री "भाषाविज्ञान उस विज्ञान को कहते हैं, जिसमें सामान्य रूप से मानवी भाषा


का, किसी विशेष भाषा की रचना और इतिहास का, भाषाओं या प्रादेशिक भाषाओं के वर्गों की समानताओं


और विषमताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।" डॉ. श्यामसुन्दरदास भाषाविज्ञान उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें भाषा मात्र के भिन्न-भिन्न अंगों और स्वरूपों का विवेचन और निरूपण किया जाता है।


देवेन्द्रनाथ शर्मा - ‘‘भाषाविज्ञान का सीधा अर्थ है- 'भाषा का विज्ञान और विज्ञान का अर्थ है विशिष्ट ज्ञान।" इस प्रकार भाषा का विशिष्ट ज्ञान भाषाविज्ञान है। देवीशंकर द्विवेदी - विवेदी जी भाषाविज्ञान को 'भाषिकी' कहते हैं। उनके अनुसार भाषिकी में भाषा का वैज्ञानिक विवेचन किया जाता है।


डॉ. बाबूराम सक्सेना - "भाषाविज्ञान का अभिप्राय भाषा का विश्लेषण करके उसका दिग्दर्शन करना है। " राजेन्द्र द्विवेदी “ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन के सहारे भाषा के जन्म, गठन, विकास, स्वरूप, अंग, परिवार आदि का विवेचन करने वाले शास्त्र को भाषा विज्ञान कहते हैं. अंबाप्रसाद सुमन "भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भाषाओं का सामान्य रूप से या किसी एक भाषा का विशिष्ट रूप से प्रकृति, संरचना, इतिहास, तुलना, प्रयोग आदि की दृष्टि से सिद्धांत निश्चित करते हुए वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है।"


डॉ. नगेन्द्र - "भाषा या भाषाओं के सर्वपक्षीय एवं सांगोपांग विवेचन का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने वाला विज्ञान भाषाविज्ञान है।" डॉ. उदयनारायण तिवारी - “भाषा शास्त्र का विषय भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करना


हैं। इस अध्ययन की सीमा के अन्तर्गत मानव बट से निःसृत वाणी, प्राचीन तथा अर्वाचीन, संस्कृत एवं असंस्कृत विद्वान एवं निरक्षर सभी के भाषा के रूपों का समावेश करती है।" डॉ. कपिलदेव द्विवेदी “भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भाषा का सर्वांगीण विवेचनात्मक


अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। "


आचार्य किशोरीदास वाजपेयी "भाषा सम्बन्धी विशेष ज्ञान युक्ति युक्त ढंग से प्राप्त करना 'भाषाविज्ञान है।"


आचार्य सीताराम चतुर्वेदी - "भाषा के वैज्ञानिक तत्त्व को जानने की विद्या भाषाविज्ञान है।"


डॉ. मनमोहन गौतम "भाषा विज्ञान वह शास्त्र है, जिसमें ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा भाषा की उत्पत्ति, बनावट, प्रकृति, विकास तथा न्हास आदि की वैज्ञानिक व्याख्या की जाती


17) डॉ. सरयू प्रसाद अग्रवाल - "भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जो संसार की प्रत्येक भाषा पर लागू होने वाले सिद्धान्तों का निर्धारण करता है।"


पाश्चात्य विद्वान : परिभाषाएँ


1) व्हीटनी (Whitney) ‘भाषा अपनी संपूर्णता में भाषाविज्ञान के अध्ययन का विषय है । इसमें मानवीय


वाणी के सभी संभव रूप आ जाते हैं, चाहे वह मनुष्य के मस्तिष्क या मुख में जीवित हो या दस्तावेजों में सुरक्षित अथवा ताम्रलेखों या शिलालेखों में सुरक्षित हो।'


2) प्रो. रॉबिन्स 'सभी देश कालों की मानव-भाषा के समग्र रूपों एवं प्रयोगों का वैज्ञानिक अध्ययन भाषाविज्ञान कहलाता है।'


3) ब्लूम फील्ड 'भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जो भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन, सामान्य एवं विशेष रूप से करता है।" (Linguistic is a science which concerns with the scientific study of language in general as well as in particular.) ब्लूम फील्ड यह भी विचार हैं कि जिसमें लिखित भाषा का अध्ययन किया जाता है, उसे Philology कहते हैं, और जिसमें बोलचाल की भाषा का अध्ययन किया जाता है उसे Linguistic कहते हैं।कार्ल वासलर इन्होंने शब्द और अर्थ तत्त्व पर बल देते हुए भाषाविज्ञान की यह परिभाषा की है. 'Linguistics means profound philosophy of language in general as well as in particular.' आस्कर लुइस चावरिया"The general term linguistics includes in addition to descriptive linguistics historical and comparative study of language. अर्थात "भाषाविज्ञान में वर्णनात्मक भाषाविज्ञान के अतिरिक्त भाषा के ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक अध्ययन का समावेश होता है।"


हॉकेट - "भाषा के बारे में उपलब्ध व्यवस्थित ज्ञान को भाषाविज्ञान कहते हैं।”


मारियो पेई - ‘‘वह शास्त्र जिसमें भाषा, शब्दों एवं भाषायी नियमों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता


है, भाषाविज्ञान कहलाता है।" Dictionary of Linguistics - ‘भाषाविज्ञान भाषा का विज्ञान है।' (Lingustics : The Science


) of Language)


उपर्युक्त परिभाषाओं का अनुशीलन करने से स्पष्ट होता है।


भाषाविज्ञान की व्याप्ति, संरचना, अध्ययन की दिशा आदि में मतभिन्नता होने के कारण परिभाषाओं मेंअंतर दिखाई देता है।

कई परिभाषाएँ भाषा के अध्ययन-विश्लेषण आदि भाषाविषयक सामान्य बातों तक ही सीमित रही हैं।कई परिभाषाओं का दृष्टिकोण वर्णनात्मक होकर उन्होंने भाषा के ऐतिहासिक, तुलनात्मक और सैद्धांतिक 


    बातों को महत्त्व दिया है।             सारांश यह कि भाषाविज्ञान


वह विज्ञान है, जिसमें भाषा विषयक जाता है। भाषाविज्ञान की परिभाषा के बारे में हम कह सकते हैं कि भाषाविज्ञान वह विज्ञान है, जो का वैज्ञानिक रीति से सम्यक अध्ययन करता है।

शिवाजी महाराजांचे किल्ले प्रशासन

 (Dr. Dhere V. D.)

B.A.I sem II   History  Paper II किल्ले प्रशासन

B.A.I sem II   History  Paper II 

शिवाजी महाराजांचे किल्ले प्रशासन.

     शिवाजीमहाराजांनी किल्ल्यांची बांधणी दुरुस्ती व संरक्षण व्यवस्था याकडे विशेष लक्ष पुरविले होते. शिवाजी महाराजांचा जन्म किल्ल्यात झाला, त्यांना वैभव किल्ल्यात मिळाले, त्यांनी स्वराज्याचे संरक्षण किल्ल्यांच्या द्वारे केले. किल्ल्यांच्या बारकाई बद्दल शिवाजी महाराजांचा अभ्यास खूप मोठा होता. उजाड माळ असेल आणि परचक्र आले तर प्रजा भग्न होते त्यामुळे किल्ल्यांच्या बांधण्याची गरज आहे किल्ल्याच्या अधारावर एक सशस्त्र सैनिक दहा शत्रूशी  तर दहा सैनिक 100 सैनिकांशी तर शंभर सैनिक हजारो शत्रू सैन्याची लढू शकतात. हे शिवरायांनी जाणले होते. त्यामुळे त्यांनी अस्तित्वात असलेल्या किल्ल्यांची डागडुजी केली अनेक ठिकाणी नवीन किल्ले बांधले तर जे किल्ले आहेत ते संरक्षण दृष्ट्या अत्यंत भक्कम बनविले. शिवाजी महाराजांच्या काळात एकही किल्ला फंद फितुरीने शत्रूच्या ताब्यात गेला नाही. याउलट शत्रूचे अनेक किल्ले जिंकून अथवा फंद फितुरीने शिवरायांनी  आपल्यात घेतले. याचे महत्वाचे कारण म्हणजे किल्ले बांधणी अथवा डागडुजी इतकेच किल्ल्यावर सैन्य व्यवस्था व इतर व्यवस्थेची कडे त्यांनी विशेष लक्ष पुरवले होते. कोणताही किल्ला जहागिरीने त्यांनी किल्लेदाराकडे सोपवला नाही. तर बाईक शिपायापासून ते किल्लेदार अथवा वरिष्ठ अधिकाऱ्यांपर्यंत दरमहा रोख वेतन देऊन त्यांना नोकरीत सामावून घेतले. जहागिरी पद्धतीचे दोष त्यांना पूर्ण माहिती होते. त्यामुळेच ही पद्धत न वापरता त्यांनी वेतनधारी नोकर नियुक्ती केली. राजा हाच सार्वभौम असला तरीही त्याला मदतीसाठी अष्टप्रधान मंडळ नेमले. त्यामध्ये सेनापती आणि सरलष्कर हे दोन सेनेविषयी एक अधिकारी असले तरीही राजाचा निर्णय अंतिम होता.

शिवाजी महाराजांच्या किल्ल्यांची एकूण संख्या जरी निश्चित सांगता येत नसेल तरीही अंदाजे ३६०/३६५ किल्ले शिवाजी महाराजांकडे होते. यामध्ये डोंगरी किल्ले भुईकोट किल्ले आणि पाण्यातील जलदुर्ग असे विविध प्रकारचे किल्ले होते. जंगलाने व्यापली व्यापलेल्या डोंगरावर बांधलेले गिरीदुर्ग, ज्या किल्लेदाराच्या  पराक्रमाने कुणीही आक्रमणाचे धाडस करत नसलेले नरदुर्ग, आवश्‍यकतेनुसार जमिनीवर बांधलेले भुईकोट आणि सुरत मोहिमेनंतर समुद्रात उभा केलेली जलदुर्गांची रांग याबाबत स्वतः महाराज म्हणतात की, शेतकरी जसे आपल्या शेतात बांध कुंपण घालतो, कोळी जसे आपल्या तारवस खिळे मारून बळकटी आणतो त्याचप्रमाणे राज्यास बळकटी आणण्यासाठी किल्ल्यांची सभोवती माळ असायलाच हवी.

     असलेल्या किल्ल्यांना बळकट आणणे, नवे किल्ले बांधने, जिंकलेले किल्ले बळकट बनवणे या सगळ्या बरोबरच अत्यंत महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे किल्ल्याचे प्रशासन. कारण आपण अत्यंत कष्टाने किल्ला मजबूत बनविला किंवा नवा बांधला आणि शत्रूने सहजगत्या तो जिंकून घेतला तर आपले सर्व श्रम आणि परिसर शत्रूच्या ताब्यात जातो यामुळे किल्ल्याच्या प्रशासनाकडे शिवाजी महाराजांनी विशेष लक्ष पुरविले.

किल्ले प्रशासनाची शिवरायांनी दोन भाग केले.

  बाह्य प्रशासन.आणिअंतर्गत प्रशासन.

बाह्य प्रशासन

शत्रूला सहज जिंकता येणार नाही अशा अडचणीच्या जागी व आपल्या संरक्षणाच्या दृष्टिकोनातून महत्त्वाच्या मोक्याच्या जागी शिवरायांनी केले उभे केले. किल्ल्याच्या तटबंदी बाहेर तटसरनोबत या अधिकाऱ्यांच्या नेतृत्वाखाली अस्पृश्य समजल्या जाणार्‍या जातीतील सैनिकांची नेमणूक केली. ज्यांना पळवाटा अडचणीच्या वाटा माहिती आहेत अशा लोकांची नेमणूक केल्याने किल्ल्यांची बाहेरील बाजू अत्यंत सुरक्षित व भक्कम बनली.

अंतर्गत प्रशासन.

किल्ला अभेद्य आहे सैन्य भरपूर आहे पण तरीही फंद फितुरीने अथवा एखाद्या अधिकार्‍याच्या चुकीने किल्ला शत्रूच्या ताब्यात जाऊ शकतो याची दक्षता घेऊन शिवरायांनी अत्यंत कौशल्याने व दूरदृष्टीने किल्ल्यावर विविध अधिकाऱ्यांच्या नेमणुका केल्या. किल्ल्यावर समान दर्जाचे तीन अधिकारी नेमले १) हवालदार २) सबनीस ३) कारखानीस.

हवालदार.       किल्ल्याच्या संरक्षणाची संपूर्ण व्यवस्था हवालदार या अधिकाऱ्याकडे होती. हा मराठा जातीतील शूर, कर्तव्यदक्ष व स्वामीनिष्ठ अशाच व्यक्तीची नेमणूक शिवाजी महाराज करत असत. हवालदाराकडे किल्ल्याच्या चाव्या असत. किल्ल्याचे दरवाजे सूर्योदयानंतर उघडणे व सूर्यास्तापूर्वी बंद करणे. दिवसा रात्री पहारा गस्त याकडे लक्ष देणे. ही त्याची जबाबदारी होती. किल्ल्यावरील शिबंदी मेटा यांच्याकडे लक्ष पुरवणे दारुगोळा तोफा दुरुस्त आहे/ नाही ही पाहणी करणे. आवश्यकतेनुसार मागणी करणे ही त्याची कामे होती.

दर तीन वर्षांनी हवालदाराची दुसऱ्या किल्ल्यावर बदली केली जात असे.

सबनीस.           ब्राह्मण जातीतील व्यक्तीची सबनीस म्हणून निवड केली जाई. किल्ल्यावरील मुलकी जमाखर्चाचा व्यवहार पाहणे, हिशोब ठेवणे, सैनिकांची हजेरी पाहणे, आवश्यक खर्च कोणता याची माहिती देणे, आवश्यक बाबी ची मागणी करणे, आणि इतर दोन अधिकाऱ्यांच्या मागणी पत्रावर संमतीदर्शक सह्या करणे हे त्याचे काम असे.

दर चार वर्षांनी सबनीसाची दुसऱ्या किल्ल्यावर बदली केली जात असे.

कारखानीस.         प्रभू जातीतील व्यक्तीची कारखानीस म्हणून निवड केली जात असे. किल्ल्यावरील अठरा कारखाने जे आहेत त्यांचे नियंत्रण त्यांना करावे लागे. याशिवाय हवालदार व सबनीस यांच्या सोबत किल्ले प्रशासनात सहभागी व्हावे लागे. धान्यपुरवठा, दारुगोळा, किल्ल्याची डागडुजी, शस्त्रास्त्रांची साठे, निर्मिती याबाबतची संपूर्ण जबाबदारी ही कारखानिसकडे होती. युद्धात पकडली युद्धकैदी, हत्ती, घोडे, उंट हे कारखानीसाच्या ताब्यात असत.

दर पाच वर्षांनी कारखानीसांची दुसऱ्या किल्ल्यावर बदली केली जात असे

वरील तीनही अधिकारी हे समान दर्जाचे होते. प्रत्येकाने आपल्या मागणी पत्रावर व अहवाला वर दुसऱ्या दोन अधिकाऱ्यांच्या सह्या घेणे बंधनकारक होते.

किल्ले संरक्षणासाठी सैनिकांची व्यवस्था....

        किल्ल्यावरील सैनिकांची नेमणूक स्वतः शिवाजी महाराज पारखून करत असत. किल्ल्याच्या संरक्षणासाठी किल्ल्याच्या आकारमान व गरज यावरून सैनिकांची नेमणूक केली जात असे साधारणतः 400 ते 500 सैनिक ( शिबंदी) किल्ल्यावर नेमले जात. तर दोन-तीन तटसरनौबत यांची नेमणूक केली जाई. किल्ल्याच्या तटबंदीवर या सैनिकांच्या तुकड्या ठेवत त्यांना मेट असं म्हणत तर त्या सैनिकांना मेटकरी असे म्हटले जाई.

कडक नियमावली......

   किल्ल्यासाठी चे नियम अत्यंत कडक होते.१). ठराविक कालखंडानंतर अधिकाऱ्यांच्या बदल्या होत.२). एकाच कुटुंबातील कर्तृत्ववान व्यक्तींना अधिकारी म्हणून नेमले तर त्यांच्या नेमणुका दूरदूरच्या ठिकाणी केल्या जात ज्यायोगे ते आपसात मिळून फंदफितुरी करणार नाहीत.३) अधिकाऱ्यांनी आपल्या बायका-मुलांसह किल्ल्यावर राहणे बंधनकारक होते.४). सूर्योदयापूर्वी अथवा  सूर्यास्तानंतर गडाचे दरवाजे उघडले जात नसत.५). राजगृहाची स्वच्छता व संरक्षण करण्याची जबाबदारी हवालदारावर होती.६). हवालदाराने राजगृहाच्या बाहेर पायरीला उशी करून उषाखाली  गडाच्या किल्लया घेऊन झोपावे असा नियम होता.७). फंद फितुरी करून गेल्यास अशा व्यक्तीला कोणत्याही किमतीवर परत आणून त्याची हत्या करून त्याचे शीर भाल्याच्या टोकावर ठेवून सर्व किल्ल्यावरून फिरवले जाई.

 सैन्याची रचना पुढील प्रमाणे होती.

पाईक किंवा सैनिक. १० सैनिकावर एक नाईक

 नाईक.                     ५  नाईक  एक हवालदार

हवालदार.                ३  हवालदार एक जुमलेदार

जुमलेदार.             ७/८  जुमलेदार एक हजारी

हजारी.                     सर्व हजारीवर एक सेनापती

 सरलष्कर.       सर्व पायदळाचा प्रमुख सरलष्कर

सेनापती.      सर्व सैन्याचा प्रमुख सेनापती

माती,पंख आणि आकाश / ज्ञानेश्वर मुळे

 बी.ए. भाग-2 पेपर क्र.-V 

प्रा.डॉ.विश्वास पाटील 

माती,पंख आणि आकाश 


ज्ञानेश्वर मुळे


ज्ञानेश्वर मुळे हे भारतीय प्रशासकीय सेवा अधिकारी व मराठी भाषेतील लेखक आहेत. यांचे माती, पंख आणि आकाश हे आत्मकथन प्रकाशित आहे. शिवाजी विद्यापीठाच्या एसवायबीएच्या अभ्यासक्रमात याचा समावेश करण्यात आला आहे. ग्रामीण भागातील मराठी माध्यमामध्ये शिकलेला मुलगा स्वत.च्या बुद्धीच्या जोरावर भारतीय परराष्ट्र सेवेत मोठी झेप घेतो, ही प्रेरणा विद्यार्थ्यांमध्ये जागवण्यासाठीच या आत्मकथनाचा विचार केला गेला आहे.


दक्षिण महाराष्ट्र साहित्य सभेचे २७ वे साहित्य संमेलनाचे ते संमेलनाध्यक्ष होते.


वारकरी परंपरा असलेल्या कुटुंबात अब्दुल लाट (ता. शिरोळ) येथे त्यांचा जन्म झाला. त्यांचे शिक्षण अब्दुल लाट, कोल्हापूरचे विद्यानिकेतन, शहाजी छत्रपती महाविद्यालय आणि शिवाजी विद्यापीठात झाले. मूळचे कवी असलेल्या मुळे यांचे जोनाकी (१९८४), दूर राहिला गाव (२०००), रस्ताच वेगळा धरला (२००५), स्वतःतील अवकाश (२००६) हे कवितासंग्रह प्रसिद्ध आहेत. ओरिया साहित्यिक रमाकांत रथ यांच्या 'श्री राधा' या खंडकाव्याचा त्यांनी अनुवाद केला आहे.


माणूस आणि मुक्काम, रशिया - नव्या दिशांचे आमंत्रण (२००६) , ग्यानबाची मेख, नोकरशाईचे रंग (२००९) ही त्यांची पुस्तकेही प्रसिद्ध आहेत. मुळे यांनी हिंदीमध्येही काव्यलेखन केले असून ऋतु उग रही है (१९९९), अंदर एक आसमान(२००२), मन के खलिहानो में (२००५), सुबह है की होती नही (२००८) हे हिंदी कवितासंग्रह प्रसिद्ध आहेत. हिंदी, उर्दू, कन्नड, अरेबिक भाषांमध्ये त्यांच्या साहित्याचा अनुवाद झाला आहे.


ज्ञानेश्‍वर मुळे हे कडोली मराठी साहित्य संघाच्या वतीने १४ जानेवारी २०१८ रोजी झालेल्या ३३व्या कडोली मराठी साहित्य संमेलनाचे अध्यक्ष होते.

महात्मा फुले

 राधानगरी महाविद्यालय राधानगरी

 बी ए भाग एक

 मराठी आवश्यक 

 विषय शिक्षक: प्रा. डॉ. विश्वास पाटील

 महात्मा फुले (इ.स. 18 27- 18 90) महात्मा ज्योतिराव फुले हे आधुनिक भारतातील एक अत्यंत महत्त्वाचे समाजसुधारक, शिक्षण तज्ञ, तत्त्वचिंतक व साहित्यिक होते. त्यांनी शोषित जनसमूहांच्या दुःख दैन्याचा वस्तुनिष्ठ अन्वयार्थ. त्यांच्या शोषण मुक्तीची एक मूलगामी विचारसरणी मांडली. सत्यशोधक समाजाची स्थापना करून समाजपरिवर्तनासाठी कार्यकर्त्यांचे संघटन उभे केले. शोषितांचे मुक्ती, स्वातंत्र्य, मानवी प्रतिष्ठा, समता, सामाजिक न्याय, श्रमप्रतिष्ठा हा क्रांतिकारी मूल्य विचार त्यांनी दिला. मुला - मुलींच्या शिक्षणासाठी शाळांची स्थापना, विधवा-पुनर्विवाह साहाय्य, बालहत्या प्रतिबंधक गृह, अस्पृश्यांसाठी पाण्याचा हौद खुला करणे, सावकारशाही विरुद्ध शेतकऱ्यांचे संघटन व उठावाचे नेतृत्व करणे. यासारख्या त्यांच्या प्रत्येक कृतीमधून शोषितांच्या मुक्तीचा ध्यास प्रकटतो. तृतीय रत्न, छत्रपती शिवाजी राजे भोसले यांचा पोवाडा, ब्राह्मणांचे कसब, गुलामगिरी, हंटर आयोग पुढील शैक्षणिक निवेदन, शेतकर्याचा असुड, मराठी ग्रंथकार सभेस पत्र, सत्सार, इशारा, सार्वजनिक  सत्यधर्म पुस्तक, अखंड वगैरे साहित्यामधून कृषी जनसमूहाच्या पर्यायी वांग्मयीन संस्कृतीचे बीजारोपण त्यांनी केले. महात्मा फुले यांचे दोन अखंड अभ्यासक्रमांमध्ये समाविष्ट केलेले आहेत मानवांचा धर्म एक या खंडामध्ये मानवाने स्वतःला सोयीसाठी अनेक धर्म देव निर्माण केले आहेत. त्यातून त्याचे हित होण्याऐवजी शोषणच होत असते. सर्वांचा निर्मिक एकच आहे. त्याला स्मरून न्यायाने सर्व वस्तूंचा उपभोग घ्यावा. धर्माच्या नावाने आपापसात न भांडता सर्वांनी सत्य हा एकच धर्म मानवा असे मानवतावादी विचार महात्मा फुले यांनी मांडले. निर्मिकाने पृथ्वी निर्माण करताना कोणताही भेदभाव केला नाही. त्याने सर्वांसाठी समान तृण, वृक्ष, गोमटी फळे आपणास देऊ केले आहे. त्याप्रमाणे आपण मानवता हा एकच धर्म मानवा असे आव्हान महात्मा फुले यांनी या अखंड मध्ये केले आहे. 

 धीर या खंडांमध्ये व्यक्ती व समूह जीवनामध्ये धैर्याचे महत्त्व सांगितले आहे. फुल्यांनी  मांडलेले विचार आजही उपयुक्त आहेत.

प्रज्ञा दया पवार

 राधानगरी महाविद्यालय राधानगरी

 *बी ए भाग -एक

मराठी आवश्यक* 

विषय शिक्षक: प्रा डॉ विश्वास पाटील

     प्रज्ञा दया पवार (जन्म 19 66)

         नव्वदोत्तर कालखंडातील महत्त्वाची कवयित्री. अंत:स्थ, उत्कट जीवघेण्या धगीवर, मी भिडवू पाहतेय समग्रासी डोळा, आरपार लयीत प्राणांतिक, दृश्यांचा ढोबळ समुद्र हे त्यांचे कवितासंग्रह प्रकाशित आहेत. अफवा खरी ठरावी म्हणून हा कथासंग्रह. केंद्र आणि परिघ. धांदात खैरलांजी ही त्यांची नाटके. मी भयंकराच्या दरवाजात उभा आहे, विमुक्तांचे स्वातंत्र्य ही संपादने. महाराष्ट्र शासनाचा कवी केशवसुत वांग्मय पुरस्कार तसेच यशवंतराव चव्हाण मुक्त विद्यापीठ नाशिक व महाराष्ट्र फाऊंडेशन यांचेही पुरस्कार प्राप्त. त्यांच्या कवितांचे अनुवाद मल्याळम, तमिळ, तेलुगु, कन्नड, गुजराती, हिंदी, बंगाली, रशियन आणि इंग्रजी मध्ये झालेले आहेत. पद्मश्री दया पवार प्रतिष्ठान मुंबई या संस्थेच्या कार्याध्यक्ष, सामाजिक चळवळीत विशेषता स्त्री संघटनांमध्ये सहभाग, ज्ञानसाधना महाविद्यालय ठाणे येथे प्राध्यापक म्हणून कार्यरत.                                एकविसाव्या शतकात स्त्रियांच्या जगण्याचे अवकाश विस्तृत झाले असले तरी आजही तिच्याकडे माणूस म्हणून पाहिले जात नाही ही शोकांतिका आहे. स्त्री आणि पुरुष मानवी जीवनातील संवादी अनुबंध असले तरी ही पुरुषाची स्त्रीकडे पाहण्याची दृष्टीही एक उपभोगाची वस्तू अशीच आहे. आज ही पुरुष स्त्रीच्या संपूर्ण देहावर आपली मालकी बांधतो. परंतु आधुनिक स्त्रीने पुरुषाच्या भोगाचे साधन बनणे नाकारले. त्यातून स्त्रीला आपले माणूस म्हणून अस्तित्वात असणे गरजेचे असल्याचे अधोरेखित होते. 

   माणसासारखा माणूस असूनही या कवितेत पुरुषांच्या मनातील स्त्री बद्दलचे नकारात्मक विचार व्यक्त झालेले आहेत. स्त्री आपल्या अस्तित्वासाठी झगडत असताना त्याला असे वाटते की तिची नग्न धिंड काढावी, तिला चाबकाने फोडवे, उकळत्या तेलामध्ये हात घालायला लावून तिची कठोर सत्वपरीक्षा घ्यावी, तिच्या स्त्री देहाचे लचके तोडून त्याला आपलं पुरुष पण दाखवून द्यायचं असतं परंतु त्याला आता यातील काहीच करता येत नाही. कारण स्त्री ही आपल्या अस्तित्वासाठी जागृत झालेली आहे. तिला जगण्याचं भान आले आहे. आजपर्यंत इथल्या पारंपरिक समाजव्यवस्थेने पुरुषांची प्रतिमा सुसंस्कृत आणि पुरोगामी अशी चित्रित केली आहे. त्यांच्या घरात महापुरुषाचे फोटो आहेत, मात्र त्यांच्या मनात स्त्रीबद्दल अस्थाच भरलेली दिसते. या कवितेतून कवयित्री समता व न्यायाची अपेक्षा व्यक्त करुन मानवी मूल्य हे सर्वश्रेष्ठ मूल्य असल्याचे सूचित करते.       आग आणि फुफाटा या कवितेमधून पुरुषप्रधान संस्कृतीचे चित्रण केलेले आहे. अनेकदा पुरुषी मानसिकतेने आदर्श बसनवलेला चेहरा प्रत्यक्षात संकुचित असतो. स्त्रीने कितीही प्रगती केली तरी ती बंड करू शकत नसल्याचे दिसते. एखाद्या स्त्रीने आत्मसन्मानासाठी बंड केले तरी काही होऊ शकत नाही. कारण शेवटी ती बाई आहे. अशी गळचेपी करणारी ही व्यवस्था आहे. पारंपारिक समाजव्यवस्थेत आग आणि फुफाटा हे दोनच पर्याय त्यांच्यापुढे आहेत. हे वास्तव कवयित्री सूचित करते. नीतिमत्तेच्या नावाखाली पुरुषांची पाशवी वृत्ती स्त्री रोज अनुभवत असते. अशी स्त्री वेदना अस्वस्थता निर्माण करते.

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